एक ललित निबन्ध :कविता

  ललित निबन्ध : कविता

                कविता
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            मन का  भाव जब ललित हो कर किसी नदी की तरह बहने लगे तो भावुक मन मयूर की तरह नाचता है ,रिसते घाव की तरह पीरता है और सन्नाटों की तरह मूक हो कर झींगता है तब वही कविता बन कर पन्नो पर चित जाती है । उस समय पत्थरो से टकराते पानी की वेदना में चीत्कार झाँकती है ।पहाड़ो का सौन्दर्य खिलखिलाता है ।आम्र मंजरियों पर मधुमक्षिकाएँ गुनगुना कर संगीत रचती हैं ।भँवरों की  छेड़छाड़ हृदय में गुदगुदी भर देती हैं । किताबों में रखे खत महकने लगते हैं और अतीत और वर्तमान धरा और गगन की तरह मिलने को आतुर हो जाते हैं । बूंदे संगीत ले कर धरा पर उतरती हैं और मेघ क्रोध में लाल-बाल हो कर अपने विरह का विरोध जताते हैं तब मेघ में समाई तड़ित कड़क कर शांत करती है मेघ को । यही सौतिया डाह ही कविता बन कर फूटती है कभी रोती हुई तो कभी गाती हुई हृदय पर आघात कर बैठती है ।
          मन के भाव उमड़े तो सागर से खारा पानी चुरा आँखो से टपकने लगता है तब निकलती है हृदय की वेदना ,चीत्कार ,हाहाकार , तड़प और आकुलता ।
         मन के भावों की उथल- पुथल जब भी भावुक हुई तभी कविता ने जन्म लिया ।इस हलचल को बाहर निकलने के लाइट किसी की आज्ञा की आवश्यकता नही वरन सारे नियम बन्धन तोड़ कर कलम की नोक पर स्वयं आ धमकती है और बरबस  चीतने लगती है पन्नों पर पन्ने और बनते चले जाते है महाकाव्य , खण्डकाव्य ,गीत ,गजल , और कविता  जिनमें हृदय के भाव जी भर कर खिलखिलाते है ,जी भर कर रोते हैं ,डूब कर नाचते हैं और मुद्राएँ बदल बदल कर दृश्य प्रस्तुत करते  हैं । वे स्वयं अपना सम्बन्ध बना कर बाहर निकलते हैं जिन्हें कभी आकाश पुकारता है तो कभी धरती आलिंगित करती है । झरनों के शब्द अपने हैं तो सागर की लहरों की उमड़न सागर की विवशता । पत्थरो की गुरुता उनमे स्वयं बसती है और ब्रह्मांड के पूर्ण सौंदर्य सौष्ठव पर मन का ही अधिकार है जिससे केवल कविता ही निसृत होती है ।
        किसी क्रौंच पक्षी की मृत्यु पर उमड़े वाक्य  भी तो कविता है जिन्होंने करुण रस की उतपत्ति कर डाली । उसी रस में सम्पूर्ण हृदय का रस समाहित पहली बार पन्नो पर चीता गया ।
             रवि का ताप ,अग्नि की दहन ,मौत से साक्षात्कार और सागरतल के संसार का अहसास भी तो हृदय का ही भाव है क्योंकि यही तो वहाँ पहुँच जाता है जहां किसी के पहुंचने की कोई संभावना नही है । पीड़ा में घुस कर चुपचाप रिसता है और किसी के संगीत में रम कर सिर धुनता है । तपिश में सीधे प्रवेश कर दहन सहता है ।एकांत में बातें करता है और भीड़ में शांत रहता है ।एक सीधे सादे व्यक्ति को सूरदास ,तुलसीदास मीरा ,राधा या फिर हीर -रांझा बना देता है ।
              व्यक्ति में कवितत्व ही विशिष्ट है जिसमें बसा उसी को सूक्ष्मतम बना डाला ।चींटी जैसे प्राणी पर सोचनेवाला व्यक्ति सामान्य तो नही हो सकता । घोड़ा और हाथी सबसे समझदार जानवर है लेकिन घोड़े की सरपट दौड़ पर सोचने वाले व्यक्ति सामान्य  नही हो सकता । यदि उसके भाव किसी लय या ताल में बन्ध कर फूट पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या ?
            कविताओं के संसार मे रहनेवाला व्यक्ति रात में जागता है और अहसास में जीवित रहता है ।एहसास उसका उत्तरीय है जिसे लपेटे सौंदर्य ,विद्रूपता ,महक ,दुर्गन्ध ,संगीत व किसी की मृत्यु के समय भी एहसास करता है । कभी फूट पड़ता है और कभी सन्नाटों को ओढ़ लेता है । ऐसे अहसास को किसी नियम -बन्धन ,ताल ,छंद ,गति ,अवरोध ,संगीत या स्वर की आवश्यकता नही । वह भाव स्वयं स्वर बन कर अपने संगीत के साथ अपनी लय ,छंद और गति के साथ जो झरना फूटता है वही तो कविता है ।

       सुशीला जोशी 'विद्योत्मा'
   मुजफ्फरनगर 251001
    मार्च 14 -2020
       sushilajoshi24@gmail. com


Comments

  1. बहुत सुंदर भाव भरा सार्थक लेख , बधाई

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