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Showing posts from April, 2020

पुस्तक समीक्षा : माँ एक ग़ज़ल -ए आर आजाद

न            माँ : एक ग़ज़ल -एक विहंगम दृष्टि          ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^           माँ : एक ग़ज़ल श्री ए० आर० आजाद जी द्वारा रचित  माँ के प्रति अपनाए गए एक वृहद दृष्टिकोण का जीता जागता दस्तावेज है । माँ  की परिभाषा शब्दो मे समाहित नही की जा सकती ।वह एक वृहद आकाश की तरह पूरी कायनात में प्रसारित है । माँ शब्द एक जीवन का आधार , एक शरीर की रचनाकार , समर्पण की अतल गहराई , ममता का महासागर , करुणा की मूर्ति , एक दृढ़ प्रतिज्ञा , परोपकार का साक्षात्कार , धीर वीर गम्भीर गुरु , सहनशीलता की पराकाष्ठा , एक सम्पूर्ण मनोरंजन , अंतिम छोर तक कि सन्तुष्टि , संस्कारों की अधिष्ठात्री व उनका बीजारोपण करनेवाली एक कृषक , सन्तति को सही आकार देने वाली एक कुम्हार और त्याग की साक्षत मूर्ति एक संत है । एक ऐसा शब्द जिसमे पूरा  ब्रह्माण्ड समाया है जिसमें पूरी कायनात हँसती है लेकिन दुख एक कोने में छिप कर रोता है । यही वह सपना है ,वह इच्छा है ,वह ऋण है जिसे पूरा करने में माँ अपने जीवन को भी दाँव पर लगा देती है ।...

पुस्तक समीक्षा: छंदालिका ; छंदालिका मेरी दृष्टि में

 *सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका  मेरी दृष्टि में*......        कुछ दिन पूर्व सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका सुशीला जी के कहने पर मेरे पास सीधे प्रकाशक से आईं। मुझसे इस पुस्तक के छंद- शोधन  की  बात कही गयी थी ।  पुस्तक पढ़ने पर आश्चर्य इस बात पर हुआ कि एक महिला एक हीसंग्रह में दोहा , रोला , घनाक्षरी ,चौपाई , कुंडलियाँ और कलाधर छंद कैसे पर पाई । पढ़ कर यह भी अनुभव किया कि सम्भवतः यह उनकी पहली  शास्त्रीय - छांदस  पुस्तक हो इसलिए मुझे उनसे संपर्क इसलिए  साधना पड़ा  क्योकि मैं नही चाहता  था कि शोधन के माध्यम से उनका अपना दृष्टिकोण , भाव, अभिव्यक्ति , कथ्य  या शब्दसंयोजन बदले या छिपे । इसलिए एक एक शब्द उन्ही के द्वारा रखा या बदला गया । उनकी छन्दों को पढ़ महसूस हुआ कि प्रकृति  उनके सृजन का प्राण तत्व हैरोला ,दोहा ,कुंडलियाँ  में प्रकृति ने उनके  दृष्टिकोण को कहीं दर्शनिक बनाया तो कहीं आध्यात्मिक । उनका सृजन सत्यं -शिवं -सुंदरम की साधिका की ओर संकेत कर रहा है --   जीवन की औकात है ,पक्का पीला पात । हवा लग...

निबन्ध: लेखन एक लत

          लेखन एक लत है ,आदत है , हृदय -अभिव्यक्ति का एक माध्यम है , विचारों को साकार रूप प्रदान करने की क्रिया है । जिसे लग गयी छूटने के नाम नही लेती ।मानव मन ही तो है जो हर परिस्तिथि में कुछ अच्छा या बुरा सोच लेता है ।जीवन हो या मरण ,आघात हो ,व्याघात हो ,पीड़ा का रिसाव हो या खुशी को झरना सब मे अपनापन डाल कर कुछ नवीन सृजन कर ही लेता है ।शताब्दी दर शताब्दी अनेंक परिवर्तनों की गाथा से इतिहास भरा पड़ा है  । जो आज है कल वह इतिहास बन जाता है किंतु साहित्य कभी इतिहास नही बनता ।हमेशा जीवंत हो कर वर्तमान हो बना रहता है । बरसों पहले मीरा की पीड़ा आज भी जीवंत है ।राधा की लगन ,कृष्ण का आकर्षण आज भी आकर्षित करता है ।मेघदूत के यक्ष की वेदना आज भी अनगिनत हृदयों में बसी है जिसे कुछ लोग लिख कर निकाल रहें हैं तो कुछ तकिए में मुँह छिपा आँखो के रास्ते निकाल रहें हैं ।चाहे जो भी हो ,जैसे भी हो है तो सब मन की ही माया ।समाज  जब मन पर वार करता ही तो कभी दंगे फसाद होते हैं  या फिर पृथ्वीराज रासो ,रामायण , या मेरे तो गिरधर गोपाल जैसे पदों को  रचना होती है ।   ...