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Showing posts from March, 2020

आलेख : रावण : एक आवश्यकता

कार्य से अधिक कारण महत्वपूर्ण है जो पूर्व निश्चित है । हर घटना का कोई न कोई कारण होता है जैसे नारायण का राम अवतार कभी नही होता अगर रावण की मृत्यु राम के हाथों न होनी होती । राम कभी रावण को नही मार पाते अगर विभीषण ने उसका गुप्त भेद राम को बताया न होता । सीता का हरण नही होता अगर सुपर्णखा को अपमानित न किया होता । इन सबके पीछे एक ही बात दिखाई देती है और वह है रावण जो रामायण में वर्णित कहानी का मूल है । यह रावण ही था जिसका वध स्वयं नारायण के अतिरिक्त कोई और कर ही नही सकता था और वही मृत्यु राम के अवतार की आवश्यकता बनी । महऋषि वाल्मीकि की रचना का आधार बनी । पूरी घटना चक्र का केंद्र बनी । यदि रावण के किरदार को रामायण से हटा कर देखे तो रामायण जैसे महाकव्य में पढ़ने ,जानने या फिर सुनने के लिए बचता ही क्या है । एक बात और ध्यान देने योग्य है कि रामायण में रावण का केवल नकारात्मक पक्ष को उजागर किया है । कहते है वह ज्ञानी ,ध्यानी , समझदार , ईश्वर भक्त और ब्रह्मज्ञानी था फिर उस पक्ष को त्रेता युग के महाकव्य में उन पक्षो का वर्णन क्यो नही मिलता...

साहित्य में अलंकारों का प्रयोग

अलंकार सौंदर्य को आकर्षक बनाने का माध्यम है ।फिर वह नारी हो या कविता । कविता में अलंकार दो प्रकार से प्रयोग किये जाते है --अनायस और सायास । सायास अलंकारो के प्रयोग कविता के कवित्व ,भावाभिव्यक्ति और आत्मा को नष्ट कर देते है और कविता शिल्प आकर्षण का केंद्रित हो कर रह जाती है ।अधिक सायास अलंकारो के प्रयोग से कविता में अर्थ-अनर्थ की दुविधा में फंस जाती है । केशव कवि की कविता अलंकारो का पुलिंदा कही जाती है ।इसलिए उनकी रचनाएँ दुरूह ,क्लिष्ट और समझ से परे कहलाई औऱ स्वयं "कठिनकाव्य का प्रेत " कहलाये । सायास अलंकारो का प्रयोग कविता के जीवन को बहुत कम करता है । आज रहीम ,कबीर के उदाहरण तो सब देते है लेकिन केशव को कोई उद्धरित नही करता । ऐसी रचनाएँ कालांतर में गायब हो जाती है । कई बार सायास अलंकार प्रयोग से कविता में क्लिष्टता का दोष भी उतपन्न हो जाता है ।। सायास अलंकार का प्रयोग केवल कवि की विद्वता के दम्भ को दर्शाती है न कि उपयोगी साहित्यकार का मार्ग दर्शन । अनायास अलंकार प्रयोग ज...

ललित निबंध: मन से कविता तक

मन ही तो है जो दिल बन कर धड़कता है । मन से ही तो मानव कहलाता है ।व्यक्तित्व का मालिक , आदतों के दास , कुकृत्यों की मशीन किन्तु धुरी तो मन ही है जहाँ सम्वेदना है ,प्रेरणा है , अहसास है ,उत्कंठा है ,अभिव्यक्ति की चाह है , भाव है विचार हैं । अदृश्य को देखने की शक्ति है । दुर्गम स्थानों पर कल्पना के पँखो से पहुँचने की क्षमता है ,विद्रूपता को परिष्कृत करने का साहस है और सत्य असत्य की पहचान की अद्भुद क्षमता है । उत्कृष्टता के संसर्ग का साक्षी है ।विभिन्न परिस्तिथियों के प्रभाव का प्रमाण है । मन ही इंद्रियों का शासक है । व्यक्तित्व के आधारभूत शक्तियों की ऊर्जा है । मन का साम्राज्य बहुत विस्तृत है ।मन की अराजकता मानव को कुरूप व अनगढ़ बनाती है । सुविचार अचेतन मन को शुद्ध करतें हैं जिसका प्रभाव तन पर भी पड़ता है । मनःस्तर व्यक्तित्व का जनक है । मुक्त मन मुक्त व्यक्तित्व की देन है । मन का भाव जब ललित हो कर किसी नदी की तरह बहता है तो भावुक मन मयूर की तरह नाचने लगता है ,रिसते घाव की तरह पीरता है और सन्नाटों की तरह मूक हो कर झींगता है तब ...

कोरोना वायरस : एक घातक महामारी

कोरोना एक ऐसा वायरस है जिसकी बनावट काँटेदार है और उसकी वाह्य परत प्रोटीन से बनी है । उसके चिकनेपन को मिटाने के लिए ही साबुन का देर तक प्रयोग करके हाथ धोने का निर्देश दिया गया । यह इंसान में बाल की मोटाई से 900गुना पतला है जो इंसान के सम्पर्क में आने से पहले मृत प्राय रहता है लेकिन सम्पर्क में आते ही आँख ,नाक ,मुँह द्वारा शरीर मे प्रवेश कर काँटेदार बनावट के कारण शरीर के भीतर घाव करके चिपक जाता है जहाँ यह मानव सैल को खा कर पहले नाक में ,गले मे अपना असर जमा कर फेफड़े ,गुर्दे व जिगर को संक्रमित कर खून में मिल जाता है जहाँ इसका नष्ट होना असम्भव है । इससे उतपन्न बीमारी को COVID-19 कहते है । यह पूरे शरीर को चुपचाप संक्रमित करता है और लक्षण उजागर होने पर इतनी जल्दी बढ़ता की चार से सात दिन में ही मृत्यु हो जाती है । कोरोना बसन्त व सर्दी ऋतु में अधिक पनपता है । कोरोना के प्रकार ...... कोरोना सात प्रकार का पाया जाता है -- 1--HCOV-229-E-- यह चमगादड़ और इंसान को संक्रमित करता है जो सिंगिल-स्ट्रॉन्डेड RNA वायरस है और साँस के माध्यम से शरीर मे प्रवेश करत...

विरोधाभास ; ,हिंदी साहित्य की एक आवश्यकता

विरोधाभास लेखन की वह अलंकार या शैली है जिससे किसी कहन में विरोध न होते हुए भी विरोधी आभास दे जाता है । जैसे - " सुधि आय , सुधि जाय " "पिल्ले तो रोज गाड़ी के नीचे आते जाते रहते है।" यद्यपि इन वाक्यों में कहीं कोई विरोध नही है लेकिन फिर भी विरोध का आभास दे रहा है । यदि विचार किया जाय तो पूरी प्रकृति विरोधाभास पर टिकी है । जन्म -मरण, दुख -सुख , प्रेम -घृणा, निर्माण -विनाश जैसे आधार ले कर प्रकृति अडिग खड़ी विरोधाभास का निर्वहन कर रही है , क्योकि ये एक दूसरे के पूरक हैं । प्रकृति को अक्षुण बनाये रखने में सहायक है । प्रकृति के क्रियाकलाप परिवर्तन व विनाश के आधार पर ही सम्भव हैं । असंगति , विभावना , और विशेषोक्ति सब विरोधाभास के ही पर्याय हैं या ये सब विरोधाभास के प्रकार हैं । *विरोधाभास क्या है? 1-- पद में कोई विरोधी बात या विचार न होते हुए भी जब कोई विरोध जताता है तो उसे विरोधाभास कहा जाता है --- या अनुरागी चित्त की, गति समझे न कोय *ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उजले होय* अवध को अपना कर त...

रावण : एक आवश्यकता

कार्य से अधिक कारण महत्वपूर्ण है जो पूर्व निश्चित है । हर घटना का कोई न कोई कारण होता है जैसे नारायण का राम अवतार कभी नही होता अगर रावण की मृत्यु राम के हाथों न होनी होती । राम कभी रावण को नही मार पाते अगर विभीषण ने उसका गुप्त भेद राम को बताया न होता । सीता का हरण नही होता अगर सुपर्णखा को अपमानित न किया होता । इन सबके पीछे एक ही बात दिखाई देती है और वह है रावण जो रामायण में वर्णित कहानी का मूल है । यह रावण ही था जिसका वध स्वयं नारायण के अतिरिक्त कोई और कर ही नही सकता था और वही मृत्यु राम के अवतार की आवश्यकता बनी । मवाल्मीकि की रचना का आधार बनी । पूरी घटना चक्र का केंद्र बनी । यदि रावण के किरदार को रामायण से हटा कर देखे तो रामायण जैसे महाकव्य में पढ़ने ,जानने या फिर सुनने के लिए बचता ही क्या है एक बात और ध्यान देने योग्य है कि रामायण में रावण का केवल नकारात्मक पक्ष को उजागर किया है । कहते है वह ज्ञानी ,ध्यानी , समझदार , ईश्वर भक्त और ब्रह्मज्ञानी था फिर उस पक्ष को त्रेता युग के महाकव्य में उन पक्षो का वर्णन क्यो नही...

एलेनोर : एक विदेशी अम्बेडकर

12 जून 1916 में अमर उजाला समाचार पत्र में श्री श्योराज सिंह बेचैन का एक लेख पढ़ा जो अमेरिका वासी एक प्रोफेसर एलेनोर ज़िलिएट जो कर्लिटन कालिज में प्रोफ़ेसर थी ,पर लिखा गया था ।उन्होंने अपना पूरा ध्यान भारत की घिनौनी अमानवीय अस्पृश्यता सम्बन्धी सोच पर केंद्रित किया और दलित समाज पर अपनी लेखनी चला सैकडों शोध-पत्र प्रकाशित कराए ।उनको शुरूआत उन्होंने मराठी दलित साहित्य से की । उन्होंने 19वी सदी के के दलित साहित्य का अध्ययन किया और अपनों थीसिस कार्य भी उसी पर केंद्रित किया । अपने शोध कार्य में ब्रिटिश दलित विषयों के साथ मराठी दलित सन्तो को अधिक महत्व दिया ।इस कार्य को करने के लिए उन्हें भारत में आ कर यहाँ की अन्य भाषाएँ भी सीखनी पड़ी किन्तु मराठी पर अपना आधिपत्य जमाये रखा ।दलित-पैंथर-आंदोलन और बाबा अम्बेडकर का गहन अध्ययन किया । श्योराज सिंह लिखते हैं कि जब एलेनोर ने बाबा अम्बेडकर से उनके दलित आंदोलन को समझने के विषय मे पूछा तो बाबा साहब का उत्तर था -"आप मेरे मूक नायक ,बहिष्कृत भारत और समता आदि पात्रों की सहायता ले सकती हैं "।एलेनोर ने "अम्बेडकर वर्ल्ड"नाम की पुस्तक लि...

किन्नर विमर्श : ट्रांसजेंडर एक उपेक्षा

^^^^^ हर प्राणी की पहचान उसकी यौनिक पहचान है । जानवरों ,पक्षियों जलचर ,थलचर या फिर नभचर में केवल दो ही योनियां । लेकिन मानव में तीन योनियाँ !! क्या कुदरत का खेल है । लड़का ,लड़की या फिर नपुंसक तीनो योनियो में से दो के सहयोग से सृष्टि का विस्तार हुआ तो तीसरे में यौन विकार के साथ साथ उसका अस्तित्व ही विकृत हो गया । वह हँसी का पात्र बन कर रह गया । समाज की उपेक्षा का शिकार बन गया । ऐसे इंसानो को सविधानमें ट्रांसजेंडर , ट्रांससेक्सुअल या इंटरसेक्स की श्रेणी में रखा गया । यह वह पहचान है जो सृष्टि को आगे बढ़ाने में अक्षम है या फिर गृहस्थी के क्रिया कलापों से स्वयं को बहुत दूर रखने को विवश है । विवशता भी ऐसी कि अपने ही माँ बाप , परिवार ,सगे सम्बन्धियों की उपेक्षा का सामना करने को विवश होना पड़ता है । माँ बाप उसे रोजी कमाने योग्य बनाना भी उचित नही समझते ।लड़का या लड़की अपनी यौनिक पहचान गर्व से अभिव्यक्त करते है किंतु यह थर्ड जेंडर अपनी यौनिक पहचान चाह कर अभिव्यक्त करने में हिचकिचाहट महसूस करते है । इसीलिए इन्हें उभयलिंगी माना गया है और न्यूट्रल स्वभाव के कारण थर्ड जेंडर ...

नई शैली का नवगीत : अभी संहार बाकी है ।

एक नई शैली का नवगीत ....... अभी संहार बाकी है ^^^^^^^^^^^^^^^^^ जातिवाद की झंझा में तू उड़ न जाना रे अभी संहार बाकी है ।। पतिव्रता जानकी सी नारी बिकती बाजारों में विस्फोटक हो क्रांतिचेतना बसती अंगारों में उस अंगार से जल न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। सीमा प्रहरी बनी अहिंसा आज खड़ी मरघट पे विधवा माँ की ताजी सिसकी है अचेत पनघट पे उस पनघट पे भीग न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। आदत नशें की बौराइ जब छलती नव ढंगों में महाकाल के ताने बाने बुनती नव रंगों में उन रंगों में भ्रमित न होना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। राजनीति बनी क्रूर भटकती अपने आयामों में पदसत्ता की लोलुपता में ढलती नव जामों में उसी जाम में बहक न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। जूझ रही भारत मानवता वाह्य हथियारों से भूख भयानक हो फिरती है अंधे गलियारों में उन गलियों में खो मत जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। ...

हिंदी उर्दू के एक अलमबरदार : बेकल उत्साही

आज का बेकल उत्साही कल का मोहम्मद शफी खान था जिसका जन्म 1 जून 1928 में बलरामपुर के गौर रमवापुर गाँव में हुआ था । उनकी आरम्भिक शिक्षा बलरामपुर के एम०पी० इनंटर क्लिक में हुई । 'बेकल'उनका साहित्यिक नाम था जो तात्कालिक भारत के प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रदान किया था ।स्वतन्त्रता संग्राम के समय अपने जन जागरण फैलाने वाले गीतों के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा । 1952 में इन्होंने एक कौमी एकता पर गीत लिखा जिसका इन्हें विरोध झेलना पड़ा ।1953में इन्होंने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक 'रसिया'लिखी । 1986 में इन्हें राज्यसभा के सदस्य के लिए मनोनीत किया गया ।बेकल जी जवाहरलाल और इंदिरागांधी के बहुत निकट रहे ।राजीवगांधी उन्हें अपना अभिभावक मानते थे । उत्साही जी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । उन्होंने अरबी ,फ़ारसी ,उर्दू ,हिंदी तथा संस्कृत भाषाओं में महारथ हासिल की । इन्हे आरम्भ से ही कविसम्मेलनों और मुशायरों का शौक था । वे श्रृंगार के अतिरिक्त सामयिक विषयों पर भी कविताएँ व गजल लिखते थे ।उनका एक शेर:- जब से हम तबाह हो गए तब से आप जहाँपनाह हो गए।...

सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका:मेरी दृष्टि में

* प्रथमत: सराहनीय प्रयासकर्त्री छंदालिका के लिए कवयित्री सुशीला जोशी को हार्दिक बधाई ,सृजन की निरन्तरता के लिए अशेष शुभकामनाएं। जोशी जी उम्र के इस पड़ाव पर एक कुशाग्र विद्यार्थी की भांति सीखने की तलब से तड़पती हुई महसूस हुई। चिनगी सुलगाने के लिए प्रशंसा की पात्र हैं, बधाई की पात्र हैं। जब मुझसे इस पुस्तक के छंद- शोधन के विषय में कहा गया,मैंने सहज भाव से हामी भरी किन्तु मन ही मन शंकित था; शंका का जादुई समाधान प्रति पढ़ने पर हुआ। आश्चर्य इस बात पर भी हुआ कि एक महिला एक ही संग्रह में दोहा, रोला, घनाक्षरी,चौपाई, कुंडलियाँ और कलाधर जैसे क्लिष्ट छंदों पर इतनी सजता से मर्म स्पर्शी सृजन कैसे कर पाई। छंद वैविध्य होने के कारण कुछ त्रुटियों को मैंने अनुभव किया, कुछ असमंजसता की स्थिति में विचरण कर रहा था कि देखते ही देखते शोधन के माध्यम से उनके दृष्टिकोण से अपने दृष्टिकोण, भाव, अभिव्यक्ति, कथ्य या शब्दसंयोजन में एकताल होता चला गया। प्रकृति उनके सृजन का प्राण तत्व है; रोला, दोहा, कुंडलियाँ में प्रकृति ने उनके दृष्टिकोण को कहीं दार्शनिक बनाया तो कहीं आध्यात...

ललित निबन्ध : मौसम

मौसम ********** मौसम, जी हाँ ।जिसको रंगत अनूठी ,अटखेलियाँ अनोखी ,संवेदना अनुपम और महक मादक ।इठलाती बयार ,गुनगुनाती ,बूंदे,लहलहाती हरियाली महीन संगीत की चादर ओढ़ वार करती ,मानव हृदय पटल पर दस्तक देती है तो मन भी उमंग ,उत्साह ,स्फूर्ति व नव परिवर्तन में रमने लगता है ।गुनगुनी धूप में प्रकृति की धड़कन की गति ,लय,ताल के अहसास को स्पर्श करती है ।कहीं चेहरे पे स्वेद की बूंदे तो कहीं फूलों पर तुहिन कणों की छुवन मन को अपने रंगों में सराबोर कर देती है । कहीं ठिठुरना तो कहीं भीगना ;कहीं छाँह की चाह तो कहीं गुनगुनी धूप की मीठी सी थपकी ;कहीं सुगन्ध का मादक अहसास के रंग यादों को तीखा करता तो कहीं आँखो को नम ।कहीं कवि की कल्पना तो कहीं प्राकृतिक सौंदर्य दर्शन के साथ उमड़ते गीत कहीं घुँघरू से छनकाते ,चूड़ियां सी खनखाते, पायल सी बजाती और फिर सबकुछ सम्मोहित सा। हर मौसम का अपना मिजाज ,अपना अहसास , अपनी शक्ति ,अपनी रंगत ,अपनी कल्पना ,अपने उपहार और अपने पर्व ।कहीं कोयल की कूक ,कहीं टटिहरी का पी-कहाँ पी-कहाँ की रटन ,कहीं पानी को तरसते प्राणी तो कहीं वृहद रूप ...

बुद्ध : एक विमर्श

बुद्ध अर्थात जिसमें बौद्धिकता चरम सीमा तक पहुच गयी हो ,अर्थात जो सम्बद्ध ही ,नर्बद्ध हो ,अर्थात जिसके प्रसाद से दृष्टि सम्यक हो गयी हो ।आज के परिबेश में ऐसी दृष्टि हो तो कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है ,बुद्ध जैसा मन और बुद्ध विचार ।आज की वैमनस्य की नीति स्वार्थपरक राजनीति में बुद्ध दृष्टि विचार हो यो चाहिए । एक अकेला बुद्ध और सम्पूर्ण एशिया उसके रंग में रंगी उसमे लीन ।वाह!क्या बुद्धत्व को पराकाष्ठा है ! बुद्ध धार्मिकता से कहीं दूर एक सांस्कृतिक आभा है जिससे धरा आलोकित है । अतिवादिता से परे एक मध्यम मार्ग पर चलनेवाला दृष्टिकोण । वीणा के तारों की तरह एक संतुलित कसी हुई विचारधारा ही तो बुद्ध है जिसकी आज अति आवश्यकता है यशोधरा का जीवन अवश्य उदास हुआ ,राहुल अवश्य तड़पा किन्तु उन दोनों की पीड़ा अधिभौतिक थी जबकि बोधिसत्व की पीड़ा मृत्यु के पार की दृष्टि जपाने की पीड़ा थी जो एक अन्तविहीन काव्य की रचना करती है। यशोधरा में आकाश के आदमी की पीड़ा समाई है किंतु बुद्ध इससे परे स्वयं के बोध की कहानी रचते है ।वृक्ष की छाया में स्वयं को पाने वाला व्यक्ति बन्धन ,वर्ग ,लिंग को छोड़ कर ब...

नवगीत

एक नव गीत यूँ ही नही कृष्ण बना मैं ।। घने तम को झेला मैने कारावास में जन्म लिया जन्मते ही मात त्याग का कालकूट भी पी ही लिया होता रहा घना घना मैं ।। उस समय तूफान बड़ा था यमुना में उफान बड़ा था सूप बैठा पिता शीश पर हृदय में प्रतिमान बड़ा था लेटा रहा ठना ठना मैं ।। मथुरा छोड़ गोकुल आया एक नया परिवार पाया नित आक्रमण मैंने झेले रहा सदा मौत का साया प्रतिदिन मरा कई गुना मैं । बड़ा हुआ राधिका आय बड़ा हुआ राधिका आयी किन्तु साथ नही रह पायी जिसे चाहा मिला नही वह जो मिला वह थी चतुराई हारा ईश मना मना मै ।। सीमा पार प्रेम हुआ जब वस्त्र वत त्यागा था मैंने राजनीतिक दाँव पेंच में निजपन भी त्यागा मैंने होता रहा फना फना मैं ।। मैंने युद्ध नही किया था गाड़ीवान था बन बैठा शाप ओढ़ वंश-नाश का रहा उमर भर अनमना मैं ।। ब्रह्म ने भेजा था मुझको द्वापर युग की बना समिधा देता रहा रोज आहूति हृदय दबाए कई दुविधा यूँ ही अच्युत नही बना मैं।। ...

एक ललित निबन्ध :कविता

  ललित निबन्ध : कविता                 कविता              ********             मन का  भाव जब ललित हो कर किसी नदी की तरह बहने लगे तो भावुक मन मयूर की तरह नाचता है ,रिसते घाव की तरह पीरता है और सन्नाटों की तरह मूक हो कर झींगता है तब वही कविता बन कर पन्नो पर चित जाती है । उस समय पत्थरो से टकराते पानी की वेदना में चीत्कार झाँकती है ।पहाड़ो का सौन्दर्य खिलखिलाता है ।आम्र मंजरियों पर मधुमक्षिकाएँ गुनगुना कर संगीत रचती हैं ।भँवरों की  छेड़छाड़ हृदय में गुदगुदी भर देती हैं । किताबों में रखे खत महकने लगते हैं और अतीत और वर्तमान धरा और गगन की तरह मिलने को आतुर हो जाते हैं । बूंदे संगीत ले कर धरा पर उतरती हैं और मेघ क्रोध में लाल-बाल हो कर अपने विरह का विरोध जताते हैं तब मेघ में समाई तड़ित कड़क कर शांत करती है मेघ को । यही सौतिया डाह ही कविता बन कर फूटती है कभी रोती हुई तो कभी गाती हुई हृदय पर आघात कर बैठती है ।           मन के भाव उमड़े तो सागर से खारा पा...

ललित निबन्ध : वसुधैवकुटुम्बकम

     एक ललित निबंध     ****************    -<<<< वसुधैवकुटुम्भकम >>>>>-       वसुधैवकुटुम्भकम -अर्थात पूरी वसुधा अपना एक कुटुम्भ  है । हमारी संस्कृति की आत्मा ,कार्य क्षेत्र और मानवीय एहसास । अर्थात -विभिन्न शरीरों में एक ही प्राण-तत्व की प्रतिष्ठा की अनुभूति ,प्राणिमात्र की रक्षा का संकल्प किन्तु हर मानव का ,हर देश का ,हर समाज का ,हर वर्ग का अपना एक अस्तित्व की चमक ,मान ,सम्मान और अभिमान देने की शपथ ।        अपने परिवार की तरह हर परिवार को अपना मान दूसरे परिवार की कन्या को अपने घर की स्वमिनी बंनाने की एक रीत ,एक परम्परा ,एक पहल और व्यष्टि मर समष्टि की कल्पना का क्रियान्वयन । उसकी सन्तान को आनेवाली पीढ़ी की इकाई का अधिकार देने का एक कर्तव्य । सम्पूर्ण धरा पर रहनेवाले किसी भी नर नारी को जोड़ा बनाने के अधिकार की भावना । कितनी विशद सोच रखनेवाली संस्कृति। साथ हो अपनी संस्कृति को विशुद्ध मौलिक रूप में बनाये रखने का एक प्रयास भी । वर्ण-संकर नस्ल तो जानवरो में भी मान्य नही । इसीलिए अपनी ज...