ललित निबंध: मन से कविता तक

मन ही तो है जो दिल बन कर धड़कता है । मन से ही तो मानव कहलाता है ।व्यक्तित्व का मालिक , आदतों के दास , कुकृत्यों की मशीन किन्तु धुरी तो मन ही है जहाँ सम्वेदना है ,प्रेरणा है , अहसास है ,उत्कंठा है ,अभिव्यक्ति की चाह है , भाव है विचार हैं । अदृश्य को देखने की शक्ति है । दुर्गम स्थानों पर कल्पना के पँखो से पहुँचने की क्षमता है ,विद्रूपता को परिष्कृत करने का साहस है और सत्य असत्य की पहचान की अद्भुद क्षमता है । उत्कृष्टता के संसर्ग का साक्षी है ।विभिन्न परिस्तिथियों के प्रभाव का प्रमाण है । मन ही इंद्रियों का शासक है । व्यक्तित्व के आधारभूत शक्तियों की ऊर्जा है । मन का साम्राज्य बहुत विस्तृत है ।मन की अराजकता मानव को कुरूप व अनगढ़ बनाती है । सुविचार अचेतन मन को शुद्ध करतें हैं जिसका प्रभाव तन पर भी पड़ता है । मनःस्तर व्यक्तित्व का जनक है । मुक्त मन मुक्त व्यक्तित्व की देन है । मन का भाव जब ललित हो कर किसी नदी की तरह बहता है तो भावुक मन मयूर की तरह नाचने लगता है ,रिसते घाव की तरह पीरता है और सन्नाटों की तरह मूक हो कर झींगता है तब वही तो कविता होती है । उस समय पत्थरो से टकराती नदी की वेदना में चीत्कार सुनाई देता है । पाहनों में सौंदर्य झाँकता है । आम्र मंजरियों पर मधुमक्खियों की गुनगुनाहट संगीत रचती है ।भँवरों की छेड़छाड़ मन को गुदगुदा देती है । किताबों में रखे खत महकते है और फूल स्मृतियों में डूब मुस्कराते हैं और अतीत वर्तमान धरा गगन की तरह मिलने की इच्छा लिए प्रयास रत हो जाते हैं । बून्दे संगीत ले कर धरा पर उतरती हैं और मेघ क्रोध में लाल पीला हो अपने विरह का विरोध जताते हैं तब मेघ में समाई तड़ित सौतिया डाह में कड़क कर शांत करती है । यही दाह तो कविता है । विरह की व्यथा कविता है जो हृदय में उमड़ कलम की नोक पर बैठ कविता बन चीतती है पन्ने कभी रोती हुई तो कभी गाती हुई आगे बढ़ती है । मन के भाव उमड़े तो सागर से खारा पानी चुरा आँखों से टपक पड़ता है तब निकलती है हृदय की आकुलता ,चीत्कार ,हाहाकार और तड़प । मन की उथल पुथल को बाहर निकलने के लिए किसी आज्ञा की आवश्यकता नही वरन सारे नियम बन्धन तोड़ स्वयं पन्नो पर चीतती है पन्ने और बनते चले जाते है काव्य ,खण्डकाव्य काव्य ,महाकाव्य , गीत ,गजल रुबाई और छंद बिना किसी बहर या पैमाने को आधार बना जिसमें हृदय के भाव खिलखलाते है ,रोते है फ़ूट कर ,नाचते हैं मुद्राएँ बदल बदल । वे स्वयं अपना संसार ले कर हृदय से बाहर निकलते है जिन्हें कभी धरती आलिंगित करती है तो कभी आकाश पुकारता है और सुधि पाठकों को बेचैन करते हैं , अन्वेषकों को व्यस्त करतें है छिपे रहस्यों को उजागर करने में । झरनों के शब्द अपनें हैं तो सागर की लहरों की उमड़न उसकी विवशता । पत्थरों की गुरुता उनमें बसती है तो ब्रह्मांड के पूर्ण सौष्ठव पर मन का ही राज है जिससे निसृत होती है केवल कविता । किसी क्रौंच पक्षी की मृत्यु पर उमड़ने वाला भाव भी तो कविता है जिसमें हृदय में समाहित सम्पूर्ण रस पहली बार पन्नो पर चीता गया । रवि का ताप ,अग्नि को दहन ,मौत जे साक्षत्कार और सागरतल के संसार का अहसास भी तो हृदय का ही भाव है क्योकि यही तो है जो वहाँ पहुँच जाता है जहाँ कोई पहुँचनर की सोच भी नही सकता क्योकि वह पीड़ा में चुपचाप घुस रिसता है और किसी के संगीत में रम सिर धुनता है । तपिश में सीधे प्रवेश कर दहन सहता है ।एकांत में बातें करता है और भीड़ में शांत रहता है । एक सीधे सादे व्यक्ति को मीरा , कबीर सूरदास ,तुलसीदास , कुमारसम्भव और मेघदूत का रचयिता बना देता है । कवित्व ही वह वैशिष्ट्य है ,जिसमे बसता है उसी को सूक्ष्मतम बना डालता है । चींटी जैसे प्राणी पर विचारने वाला व्यक्ति सामान्य तो नही हो सकता । उसकी दृष्टि सूक्ष्मतम ही होगी । पत्थरो से टकराकर वापस जाने वाली लहरों पर सोचनेवाला व्यक्ति साधारण तो नही हो सकता । घोड़ा हाथी दोनों ही समझदार जानवर हैं किंतु घोड़े की सरपट दौड़ पर ,सन्नाटो में सुक्षतम आवाज को सुन कर भावुक होनेवाला व्यक्ति कैसे साधारण कहा जा सकता है । अब अगर उसके उद्गार किसी लय में बंध कर गतिशील हो कर बहने लगे तो क्या आश्चर्य है ? कविता के संसार मे रहनेवाला व्यक्ति रात में जागता है और अहसास में जीवित रहता है ।अहसास उसका उत्तरीय है जिसे लपेटे सौंदर्य ,विद्रूपता ,महक , दुर्गंध ,संगीत व विषाद में भी कुछ नया महसूसता है इसीलिए कभी फ़ूट पड़ता है तो कभी सन्नाटो को ओढ़ लेता है । ऐसे अहसास को किसी नियम बन्धन ,ताल ,छंद ,गति ,अवरोध ,गेयता ,संगीत या स्वर की आवश्यकता नही । वह स्वयं स्वर बन कर संगीत के साथ अपनी लय ,ताल और छंद ले कर फूटता हैं और यही कविता है । सुशीला जोशी-विद्योत्मा मुजफ्फरनगर sushilajoshi24@gmail.com

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