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पुस्तक समीक्षा : माँ एक ग़ज़ल -ए आर आजाद

न            माँ : एक ग़ज़ल -एक विहंगम दृष्टि          ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^           माँ : एक ग़ज़ल श्री ए० आर० आजाद जी द्वारा रचित  माँ के प्रति अपनाए गए एक वृहद दृष्टिकोण का जीता जागता दस्तावेज है । माँ  की परिभाषा शब्दो मे समाहित नही की जा सकती ।वह एक वृहद आकाश की तरह पूरी कायनात में प्रसारित है । माँ शब्द एक जीवन का आधार , एक शरीर की रचनाकार , समर्पण की अतल गहराई , ममता का महासागर , करुणा की मूर्ति , एक दृढ़ प्रतिज्ञा , परोपकार का साक्षात्कार , धीर वीर गम्भीर गुरु , सहनशीलता की पराकाष्ठा , एक सम्पूर्ण मनोरंजन , अंतिम छोर तक कि सन्तुष्टि , संस्कारों की अधिष्ठात्री व उनका बीजारोपण करनेवाली एक कृषक , सन्तति को सही आकार देने वाली एक कुम्हार और त्याग की साक्षत मूर्ति एक संत है । एक ऐसा शब्द जिसमे पूरा  ब्रह्माण्ड समाया है जिसमें पूरी कायनात हँसती है लेकिन दुख एक कोने में छिप कर रोता है । यही वह सपना है ,वह इच्छा है ,वह ऋण है जिसे पूरा करने में माँ अपने जीवन को भी दाँव पर लगा देती है ।...

पुस्तक समीक्षा: छंदालिका ; छंदालिका मेरी दृष्टि में

 *सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका  मेरी दृष्टि में*......        कुछ दिन पूर्व सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका सुशीला जी के कहने पर मेरे पास सीधे प्रकाशक से आईं। मुझसे इस पुस्तक के छंद- शोधन  की  बात कही गयी थी ।  पुस्तक पढ़ने पर आश्चर्य इस बात पर हुआ कि एक महिला एक हीसंग्रह में दोहा , रोला , घनाक्षरी ,चौपाई , कुंडलियाँ और कलाधर छंद कैसे पर पाई । पढ़ कर यह भी अनुभव किया कि सम्भवतः यह उनकी पहली  शास्त्रीय - छांदस  पुस्तक हो इसलिए मुझे उनसे संपर्क इसलिए  साधना पड़ा  क्योकि मैं नही चाहता  था कि शोधन के माध्यम से उनका अपना दृष्टिकोण , भाव, अभिव्यक्ति , कथ्य  या शब्दसंयोजन बदले या छिपे । इसलिए एक एक शब्द उन्ही के द्वारा रखा या बदला गया । उनकी छन्दों को पढ़ महसूस हुआ कि प्रकृति  उनके सृजन का प्राण तत्व हैरोला ,दोहा ,कुंडलियाँ  में प्रकृति ने उनके  दृष्टिकोण को कहीं दर्शनिक बनाया तो कहीं आध्यात्मिक । उनका सृजन सत्यं -शिवं -सुंदरम की साधिका की ओर संकेत कर रहा है --   जीवन की औकात है ,पक्का पीला पात । हवा लग...

निबन्ध: लेखन एक लत

          लेखन एक लत है ,आदत है , हृदय -अभिव्यक्ति का एक माध्यम है , विचारों को साकार रूप प्रदान करने की क्रिया है । जिसे लग गयी छूटने के नाम नही लेती ।मानव मन ही तो है जो हर परिस्तिथि में कुछ अच्छा या बुरा सोच लेता है ।जीवन हो या मरण ,आघात हो ,व्याघात हो ,पीड़ा का रिसाव हो या खुशी को झरना सब मे अपनापन डाल कर कुछ नवीन सृजन कर ही लेता है ।शताब्दी दर शताब्दी अनेंक परिवर्तनों की गाथा से इतिहास भरा पड़ा है  । जो आज है कल वह इतिहास बन जाता है किंतु साहित्य कभी इतिहास नही बनता ।हमेशा जीवंत हो कर वर्तमान हो बना रहता है । बरसों पहले मीरा की पीड़ा आज भी जीवंत है ।राधा की लगन ,कृष्ण का आकर्षण आज भी आकर्षित करता है ।मेघदूत के यक्ष की वेदना आज भी अनगिनत हृदयों में बसी है जिसे कुछ लोग लिख कर निकाल रहें हैं तो कुछ तकिए में मुँह छिपा आँखो के रास्ते निकाल रहें हैं ।चाहे जो भी हो ,जैसे भी हो है तो सब मन की ही माया ।समाज  जब मन पर वार करता ही तो कभी दंगे फसाद होते हैं  या फिर पृथ्वीराज रासो ,रामायण , या मेरे तो गिरधर गोपाल जैसे पदों को  रचना होती है ।   ...

आलेख : रावण : एक आवश्यकता

कार्य से अधिक कारण महत्वपूर्ण है जो पूर्व निश्चित है । हर घटना का कोई न कोई कारण होता है जैसे नारायण का राम अवतार कभी नही होता अगर रावण की मृत्यु राम के हाथों न होनी होती । राम कभी रावण को नही मार पाते अगर विभीषण ने उसका गुप्त भेद राम को बताया न होता । सीता का हरण नही होता अगर सुपर्णखा को अपमानित न किया होता । इन सबके पीछे एक ही बात दिखाई देती है और वह है रावण जो रामायण में वर्णित कहानी का मूल है । यह रावण ही था जिसका वध स्वयं नारायण के अतिरिक्त कोई और कर ही नही सकता था और वही मृत्यु राम के अवतार की आवश्यकता बनी । महऋषि वाल्मीकि की रचना का आधार बनी । पूरी घटना चक्र का केंद्र बनी । यदि रावण के किरदार को रामायण से हटा कर देखे तो रामायण जैसे महाकव्य में पढ़ने ,जानने या फिर सुनने के लिए बचता ही क्या है । एक बात और ध्यान देने योग्य है कि रामायण में रावण का केवल नकारात्मक पक्ष को उजागर किया है । कहते है वह ज्ञानी ,ध्यानी , समझदार , ईश्वर भक्त और ब्रह्मज्ञानी था फिर उस पक्ष को त्रेता युग के महाकव्य में उन पक्षो का वर्णन क्यो नही मिलता...

साहित्य में अलंकारों का प्रयोग

अलंकार सौंदर्य को आकर्षक बनाने का माध्यम है ।फिर वह नारी हो या कविता । कविता में अलंकार दो प्रकार से प्रयोग किये जाते है --अनायस और सायास । सायास अलंकारो के प्रयोग कविता के कवित्व ,भावाभिव्यक्ति और आत्मा को नष्ट कर देते है और कविता शिल्प आकर्षण का केंद्रित हो कर रह जाती है ।अधिक सायास अलंकारो के प्रयोग से कविता में अर्थ-अनर्थ की दुविधा में फंस जाती है । केशव कवि की कविता अलंकारो का पुलिंदा कही जाती है ।इसलिए उनकी रचनाएँ दुरूह ,क्लिष्ट और समझ से परे कहलाई औऱ स्वयं "कठिनकाव्य का प्रेत " कहलाये । सायास अलंकारो का प्रयोग कविता के जीवन को बहुत कम करता है । आज रहीम ,कबीर के उदाहरण तो सब देते है लेकिन केशव को कोई उद्धरित नही करता । ऐसी रचनाएँ कालांतर में गायब हो जाती है । कई बार सायास अलंकार प्रयोग से कविता में क्लिष्टता का दोष भी उतपन्न हो जाता है ।। सायास अलंकार का प्रयोग केवल कवि की विद्वता के दम्भ को दर्शाती है न कि उपयोगी साहित्यकार का मार्ग दर्शन । अनायास अलंकार प्रयोग ज...

ललित निबंध: मन से कविता तक

मन ही तो है जो दिल बन कर धड़कता है । मन से ही तो मानव कहलाता है ।व्यक्तित्व का मालिक , आदतों के दास , कुकृत्यों की मशीन किन्तु धुरी तो मन ही है जहाँ सम्वेदना है ,प्रेरणा है , अहसास है ,उत्कंठा है ,अभिव्यक्ति की चाह है , भाव है विचार हैं । अदृश्य को देखने की शक्ति है । दुर्गम स्थानों पर कल्पना के पँखो से पहुँचने की क्षमता है ,विद्रूपता को परिष्कृत करने का साहस है और सत्य असत्य की पहचान की अद्भुद क्षमता है । उत्कृष्टता के संसर्ग का साक्षी है ।विभिन्न परिस्तिथियों के प्रभाव का प्रमाण है । मन ही इंद्रियों का शासक है । व्यक्तित्व के आधारभूत शक्तियों की ऊर्जा है । मन का साम्राज्य बहुत विस्तृत है ।मन की अराजकता मानव को कुरूप व अनगढ़ बनाती है । सुविचार अचेतन मन को शुद्ध करतें हैं जिसका प्रभाव तन पर भी पड़ता है । मनःस्तर व्यक्तित्व का जनक है । मुक्त मन मुक्त व्यक्तित्व की देन है । मन का भाव जब ललित हो कर किसी नदी की तरह बहता है तो भावुक मन मयूर की तरह नाचने लगता है ,रिसते घाव की तरह पीरता है और सन्नाटों की तरह मूक हो कर झींगता है तब ...

कोरोना वायरस : एक घातक महामारी

कोरोना एक ऐसा वायरस है जिसकी बनावट काँटेदार है और उसकी वाह्य परत प्रोटीन से बनी है । उसके चिकनेपन को मिटाने के लिए ही साबुन का देर तक प्रयोग करके हाथ धोने का निर्देश दिया गया । यह इंसान में बाल की मोटाई से 900गुना पतला है जो इंसान के सम्पर्क में आने से पहले मृत प्राय रहता है लेकिन सम्पर्क में आते ही आँख ,नाक ,मुँह द्वारा शरीर मे प्रवेश कर काँटेदार बनावट के कारण शरीर के भीतर घाव करके चिपक जाता है जहाँ यह मानव सैल को खा कर पहले नाक में ,गले मे अपना असर जमा कर फेफड़े ,गुर्दे व जिगर को संक्रमित कर खून में मिल जाता है जहाँ इसका नष्ट होना असम्भव है । इससे उतपन्न बीमारी को COVID-19 कहते है । यह पूरे शरीर को चुपचाप संक्रमित करता है और लक्षण उजागर होने पर इतनी जल्दी बढ़ता की चार से सात दिन में ही मृत्यु हो जाती है । कोरोना बसन्त व सर्दी ऋतु में अधिक पनपता है । कोरोना के प्रकार ...... कोरोना सात प्रकार का पाया जाता है -- 1--HCOV-229-E-- यह चमगादड़ और इंसान को संक्रमित करता है जो सिंगिल-स्ट्रॉन्डेड RNA वायरस है और साँस के माध्यम से शरीर मे प्रवेश करत...