साहित्य में अलंकारों का प्रयोग

अलंकार सौंदर्य को आकर्षक बनाने का माध्यम है ।फिर वह नारी हो या कविता । कविता में अलंकार दो प्रकार से प्रयोग किये जाते है --अनायस और सायास । सायास अलंकारो के प्रयोग कविता के कवित्व ,भावाभिव्यक्ति और आत्मा को नष्ट कर देते है और कविता शिल्प आकर्षण का केंद्रित हो कर रह जाती है ।अधिक सायास अलंकारो के प्रयोग से कविता में अर्थ-अनर्थ की दुविधा में फंस जाती है । केशव कवि की कविता अलंकारो का पुलिंदा कही जाती है ।इसलिए उनकी रचनाएँ दुरूह ,क्लिष्ट और समझ से परे कहलाई औऱ स्वयं "कठिनकाव्य का प्रेत " कहलाये । सायास अलंकारो का प्रयोग कविता के जीवन को बहुत कम करता है । आज रहीम ,कबीर के उदाहरण तो सब देते है लेकिन केशव को कोई उद्धरित नही करता । ऐसी रचनाएँ कालांतर में गायब हो जाती है । कई बार सायास अलंकार प्रयोग से कविता में क्लिष्टता का दोष भी उतपन्न हो जाता है ।। सायास अलंकार का प्रयोग केवल कवि की विद्वता के दम्भ को दर्शाती है न कि उपयोगी साहित्यकार का मार्ग दर्शन । अनायास अलंकार प्रयोग जानबूझ कर नही किया जाता । ; स्वाभाविक रूप से लेखन में जो भावाभिव्यक्ति के अनुरूप शब्द स्वतः हृदय में आते चले जाते है वे स्वयं अपने अलंकार अपने साथ ले कर आते है । ये अलंकार रचना में ढूंढने पड़ते है । अलग से दिखाई नही देते । अनायस अलंकार प्राकृतिक होते है इसलिये रचना में कृत्रिमता नही आने देते । कभी कभी वे देशज शब्द भी अलंकार का कार्य करते है जो अनायास शब्द संयोजन में स्वयं आ बैठते है । इनसे रचना का लालित्य और सौंदर्य दोनो में चार चाँद लग जाते है । लेकिन जब सायास देशज शब्दो का प्रयोग किया जाता है तो वही रचना आंचलिक रचना बन जाती है । इस सदर्भ में -- "अतिसर्वत्रवर्जयेत " सूक्ति चरितार्थ होती है । जो भी कार्य यशार्थ किया जाएगा वह दोषपूर्ण ही होगा । अतः अंतर्मन से भावों के अनुरूप जो भी शब्द हृदय द्वार को लांघ लेखनी से टपके वे अपने पूरे श्रृंगार के साथ पन्नो पर उतरते है जिनका सौंदर्य अनोखा ही होता है । उनके अनूठेपन को खोजना पड़ता है ,समझना पड़ता है । सुशीला जोशी मुजफ्फरनगर sushilanoshi24@ gmail.com

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