निबन्ध: लेखन एक लत
लेखन एक लत है ,आदत है , हृदय -अभिव्यक्ति का एक माध्यम है , विचारों को साकार रूप प्रदान करने की क्रिया है । जिसे लग गयी छूटने के नाम नही लेती ।मानव मन ही तो है जो हर परिस्तिथि में कुछ अच्छा या बुरा सोच लेता है ।जीवन हो या मरण ,आघात हो ,व्याघात हो ,पीड़ा का रिसाव हो या खुशी को झरना सब मे अपनापन डाल कर कुछ नवीन सृजन कर ही लेता है ।शताब्दी दर शताब्दी अनेंक परिवर्तनों की गाथा से इतिहास भरा पड़ा है । जो आज है कल वह इतिहास बन जाता है किंतु साहित्य कभी इतिहास नही बनता ।हमेशा जीवंत हो कर वर्तमान हो बना रहता है । बरसों पहले मीरा की पीड़ा आज भी जीवंत है ।राधा की लगन ,कृष्ण का आकर्षण आज भी आकर्षित करता है ।मेघदूत के यक्ष की वेदना आज भी अनगिनत हृदयों में बसी है जिसे कुछ लोग लिख कर निकाल रहें हैं तो कुछ तकिए में मुँह छिपा आँखो के रास्ते निकाल रहें हैं ।चाहे जो भी हो ,जैसे भी हो है तो सब मन की ही माया ।समाज जब मन पर वार करता ही तो कभी दंगे फसाद होते हैं या फिर पृथ्वीराज रासो ,रामायण , या मेरे तो गिरधर गोपाल जैसे पदों को रचना होती है ।
मन हर प्राणी में धड़कता है किंतु उसका एहसास केवल मानव में जो होता है शायद इसीलिये मानव कहलाया । व्यक्तित्व का मलिक ,आदतों के गुलाम , कुकृत्यों की मशीन बना किन्तु उसको धुरी तो मानव मन ही रही ।उसी धुरी में प्रेरणा ,सम्वेदना अहसास , उत्कंठा और अभिव्यक्ति की चाहना है । अदृश्य को देखने की शक्ति है । असाध्य को साध्य बनाने की युक्ति है । दुर्गमतम स्थानों में जाने का सहस है । विद्रूपता को को परिष्कृत करने की शक्ति है । सत्य और असत्य को पहचानने की अद्भुत क्षमता है । उत्कृष्टता के संसर्ग का साक्षी हैं विभिन्न परिस्थितियों के प्रभाव प्रमाण है ।मन ही इंद्रियों का शासक है और आधारभूत शक्तियों को ऊर्जा देता हैं
मन की अराजकता व्यक्ति को विद्रूप व अनगढ़ बना देती है ।लेखन फूहड़ता की ओर बढ़ता है ऑफ संसर्ग में प्रदूषण फैला देता है । मन का साम्राज्य बहुत विस्तृत है ।सम्पूर्ण राज्य को स्वच्छ रखने के लिए कभी कभी बुद्धि बड़ा अच्छा कार्य करती है । जब मन में अराजकता फैलती है तो बुद्धि अपनी फर्ज अदा करने से कभी नही चूकती ।इस अराजकता का प्रभाव मानव तन पर भी पड़ता है ।उसे रोकने का सिर्फ एक ही उपाय है और वह है -साहित्य सृजन ।अपने अच्छे या बुरे सभी विचार पन्नो पर उतरना ही मन के स्तर को शांत रखता है ।सुविचार अचेतन मस्तिष्क को शुद्ध रखते हैं ।मन स्तर व्यक्तित्व का जनक है ।मुक्त मन ही मुक्त भाव रखता है । और मुक्त भाव ही मुक्त व्यक्तित्व को धुरी है ।
लेखनी में परिवेश व प्रकृति बहुत सहायक होते हैं ।एम सदस्य व्यक्ति ही किसी मौसम की गहराई को महसूस करता है ।उसकी रंगत ,अटखेलियां , सम्वेदना , महक और मुस्कान के साथ उसकी वेदना कोई कवि हृदय ही समझ पाता है ।वह बहती बयार में गति रच लेती है ।उसकी महके में प्यार ढूंढ़ लेता है और बून्द का धरती पर गिर कर तड़पने की व्यथा देख लेता है । पूरी प्रकृति सहृदय मानव के मन पर बार बार दस्तक देती है जिसकी वेदना ,खुशी ,उत्साह , उमंग उसकी लेखनि के लेखनी के माध्यम से पन्नो पर उतरती है ।
आज का समाज जितना शिक्षित उतना ही
व्यवसायी भी । एक समय था जब लोग स्वान्त सुखाय लिखते थे और सहित्य की सेवा करते थे । किंतु आज का लेखक व्यवसायी है। यश और धन के पीछे चलने वाले जाल का एक शिकारी है ।लेखन में उपदेश देना और जीवन मे जाल बिछाने वाला एक कलाकार है। यश ,लिप्सा में समझौतो के गर्त में धकेला जाने वाला एक मोहरा है । व्यवसायी बनना कोई अपराध नहीं किन्तु व्यवसायी बनने के लिए साहित्य को फूहड़पन से भर डालना या फिर चंद लोगो तक ही सीमित रखना या किसी उठते हुए लेखक को हतोत्साहित करकर नीचे बैठा देना लेखक का न काम है और न ही धर्म । हर लेखन लेखन नही होता और न ही प्रचार काम और न ही प्रचार की सामग्री । लेखन के विषय मे श्री शेखर जोशी कहते है ---
" रचनात्मक लेखन एक सापेक्ष प्रक्रिया है ।मनुष्य के मानसिक संस्कार ,विभिन्न सामाजिक स्थितियों का दबाव ,राग-विराग ,भावनात्मक संवेग , संवेदन क्षमता और निजी अनुभवों को व्यापक परिपेक्ष्य में देख पाने की दृष्टि कई ऐसा कारक हैं जो मिल कर सम्वेदना का रचना तक पहूँचाय0ने में सहायक होते हैं या उसका कारण बनते हैं ।मूलतः ये परिवेशगत स्थितियाँ ही हैं जो एक रचना से दूसरी रचनाकार से भिन्न धरातल पर आंदोलित करती है ।
भीमसेन त्यागी लेखन के व्यबसायिकरण के विषय मे लिखते हैं--
" लेखक को व्यवसायी होना ही चाहिए ।जब तक लेखक पूर्णकालिक लेखक नही होगया तब तक वह पूरी संलग्नता के साथ लेखन नही कर पायेगा न ही उसकी प्रतिभा का पूरा पूरा उपयोग हो पायेगा । लेकिन व्यवसायी होने बनने से पूर्व जीवन के दूसरे क्षेत्रों का व्यापक अनुभव प्राप्त कर लेना चाहिए ।जितना उसके पास अनुभव होगा उतनी ही उसकी रचना प्रामाणिक होगी ।अतः व्यवसायी बनने के लिए जल्दबाजी ठीक नही । "
एक जागरूक लेखक को इतिहास ,परम्परा ,सामाजिक परिवेश और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से परिचित होना अनिवार्य है हमारा देख आज भी तीसरी दुनिया की श्रेणी में जकड़ा सिसक रहा है ।देश मे द
घरेलू हिंसा का बोलबाला है । सड़को पर असुरक्षा का भाव पसरा पड़ा है आज भी त्रेता युग से किसी हालत में कम नही है । ऐसे परिवेश में लेखक का दायित्व बढ़ जाता है ।लेखक को स्वयं चुनना है कि वे मुट्ठी भर शासन पोषित लोगो के साथ हैं या देश के विशाल संघर्षरत समूह के साथ ।
लेखन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है ।स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सृजन की शक्ति बनती है और आक्रामक व दलगत होड़ के मार्ग में बाधा बन जाती है । प्रतिष्ठित लेखक नए को हतोत्साहित करते हैं और उनकी पूरी ऊर्जा स्वयं को उनके समक्ष स्थापित करने में खत्म हो जाती है । व्यवस्था पक्ष के लेखक सुखासीन हैं ।यशस्वी है और अपनी धाक जमाये हैं तो वे सत्ता पक्ष के ही साथ रहेंगे किन्तु जागरूक लेखक आम आदमी की आवाज बन उनके सुख दुख में शामिल रहते हैं ।ऐसे लेखकों को यश व पुरस्कारों की लालसा छोड़ समाज के ,परिवार के , व्यक्ति के संघर्ष से जूझना पड़ेगा ।
सुशिला जोशी -विद्योत्मा
मुजफ्फरनगर
sushilajoshi24@gimail .com
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