किन्नर विमर्श : ट्रांसजेंडर एक उपेक्षा

^^^^^ हर प्राणी की पहचान उसकी यौनिक पहचान है । जानवरों ,पक्षियों जलचर ,थलचर या फिर नभचर में केवल दो ही योनियां । लेकिन मानव में तीन योनियाँ !! क्या कुदरत का खेल है । लड़का ,लड़की या फिर नपुंसक तीनो योनियो में से दो के सहयोग से सृष्टि का विस्तार हुआ तो तीसरे में यौन विकार के साथ साथ उसका अस्तित्व ही विकृत हो गया । वह हँसी का पात्र बन कर रह गया । समाज की उपेक्षा का शिकार बन गया । ऐसे इंसानो को सविधानमें ट्रांसजेंडर , ट्रांससेक्सुअल या इंटरसेक्स की श्रेणी में रखा गया । यह वह पहचान है जो सृष्टि को आगे बढ़ाने में अक्षम है या फिर गृहस्थी के क्रिया कलापों से स्वयं को बहुत दूर रखने को विवश है । विवशता भी ऐसी कि अपने ही माँ बाप , परिवार ,सगे सम्बन्धियों की उपेक्षा का सामना करने को विवश होना पड़ता है । माँ बाप उसे रोजी कमाने योग्य बनाना भी उचित नही समझते ।लड़का या लड़की अपनी यौनिक पहचान गर्व से अभिव्यक्त करते है किंतु यह थर्ड जेंडर अपनी यौनिक पहचान चाह कर अभिव्यक्त करने में हिचकिचाहट महसूस करते है । इसीलिए इन्हें उभयलिंगी माना गया है और न्यूट्रल स्वभाव के कारण थर्ड जेंडर की श्रेणी में रखा गया । हिंदी साहित्य में ही नही अपितु भारतीय संस्कृति और इतिहास में में थर्ड जेंडर का पर्याप्त उल्लेख मिलता है । कहीं किन्नर महाराजाओ के गुप्तचरों के रूप में जाने जाते है तो कहीं सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक संरचना के भिन्न भिन्न पहलुओं को सामने लाने में अपना दायित्व निभाते दिखाई देतेंहैं । स्पष्ट है कि इतिहास और पौराणिक आख्यानों ने इन्हें अनुपयुक्त नही माना । समाज और परिवार में अपना दायित्व न निभाने वाले समुदाय राजनीति में उपयोगी सिद्ध हुआ । जो समाज मनुष्य द्वारा निर्मित हुआ वही समाज किन्नर को इसलिए हेय दृष्टि से देखता है कि उसके जीवन का सेक्सुअल भाग कमजोर है या नगण्य है । वह जननी या स्रष्टा नही बन सकता ।सृष्टि को आगे बढ़ने में उसका कोई योगदान नही है । हमारे समाज का यह मानसिक विकार ही नही अपितु व्यवहारिक दृष्टि से भी गलत है । किसी व्यक्ति के किसी कमजोर पक्ष को इतना उभार कर रखना कि जीना ही दूभर हो जाय , यह बीमार मानसिकता नही कहलाएगी तो क्या कहलाएगी ।। किन्नर माता की रज और पिता के वीर्य की बराबर मात्रा में मिश्रण का परिणाम है । ऐसे भ्रूण में गर्भाशय में पनप रहे अंगो की बनावट माता और पिता के अंग बराबर भाग में बनते है इसीलिए शरीर पुरुषों और व्यवहार स्त्री जैसा होता है । युवा होने तक उनमें स्त्री और पुरुष के वाह्य और आंतरिक गुण बराबर परिमाण में विकसित होते है । उनके जनानांगों की बनावट भी स्त्री और पुरुष की मिलीजुली सी होती है जिसके कारण प्रजनन प्रक्रिया को नही अपना पाते । कुछ लोग पूर्ण रूप से पुरूष होते हुए भी मानसिक रूप से स्त्रैण होते है । जबकि वे पुरुषों की तरह गृहस्थ बना कर रह सकते है किन्तु उनकी मानसिकता उन्हें पुरुष बनने नही देती और चिकित्सा पद्धिति अपना कर स्वयं को स्त्री रूप दे देते है और स्त्रियों की तरह जीवन यापन करते है । ऐसे लोगो को शी-मेल कहते है । दूसरे शब्दों में पुरुष के शरीर मे स्त्री की कामेच्छा का द्वंद शीमेल है । ऐसे लोगो को प्राकृतिक किन्नर नही कहा जा सकता । इसीलिए न्यायालय ने इन्हें स्त्री नही माना है । न्यायालय के अनुसार किन्नर तकनीकी तौर पर पुरूष ही होते हैं । शीमेल मानसिक रूप से स्त्री पुरूष के शरीर मे फंसा महसूस करता है । जिसे एक मानसिक विकार भी माना जा सकता है । किन्नरों की आयु बहुत लंबी होती है । शोध के अनुसार साधारण मानव से किन्नर की आयु 20 वर्ष अधिक होती है । वैज्ञानिकों के अनुसार स्त्रियां पुरूष के हार्मोन टेस्टास्टरोन उनकी उम्र को कम करती है । टेस्टोस्टेरोन जिनता बाहर निकलेगा उतना ही नया बनेगा जिसमे टेस्टोस्टेरोन ग्रन्थि सक्रिय रहती है और शरीर का क्षरण होता रहता है । यदि टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को बढंने से रोक दिया जाय तो आयु लम्बी हो जाती है क्योंकि टेस्टोस्टेरोन से होनेवाले नुकसान की मात्रा कम हो जाती है । किन्नर समाज का एक सशक्त भाग है इसलिए इस भाग की उपेक्षा के स्थान पर यदि इन्हें सही दिशा दी जाय तो देश का बहुत भला हो सकता है । सेना और सुरक्षा का क्षेत्र में इनका योगदान लिया जा सकता है । सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' मुजफ्फरनगर sushilajoshi24@gmail.com

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