नई शैली का नवगीत : अभी संहार बाकी है ।

एक नई शैली का नवगीत ....... अभी संहार बाकी है ^^^^^^^^^^^^^^^^^ जातिवाद की झंझा में तू उड़ न जाना रे अभी संहार बाकी है ।। पतिव्रता जानकी सी नारी बिकती बाजारों में विस्फोटक हो क्रांतिचेतना बसती अंगारों में उस अंगार से जल न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। सीमा प्रहरी बनी अहिंसा आज खड़ी मरघट पे विधवा माँ की ताजी सिसकी है अचेत पनघट पे उस पनघट पे भीग न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। आदत नशें की बौराइ जब छलती नव ढंगों में महाकाल के ताने बाने बुनती नव रंगों में उन रंगों में भ्रमित न होना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। राजनीति बनी क्रूर भटकती अपने आयामों में पदसत्ता की लोलुपता में ढलती नव जामों में उसी जाम में बहक न जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। जूझ रही भारत मानवता वाह्य हथियारों से भूख भयानक हो फिरती है अंधे गलियारों में उन गलियों में खो मत जाना देख साथी रे अभी संहार बाकी है ।। सुशीला जोशी "विद्योत्मा" मुजफ्फरनगर sushilajoshi24@gmail.com

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