बुद्ध : एक विमर्श
बुद्ध अर्थात जिसमें बौद्धिकता चरम सीमा तक पहुच गयी हो ,अर्थात जो सम्बद्ध ही ,नर्बद्ध हो ,अर्थात जिसके प्रसाद से दृष्टि सम्यक हो गयी हो ।आज के परिबेश में ऐसी दृष्टि हो तो कल्याणकारी सिद्ध हो सकती है ,बुद्ध जैसा मन और बुद्ध विचार ।आज की वैमनस्य की नीति स्वार्थपरक राजनीति में बुद्ध दृष्टि विचार हो यो चाहिए । एक अकेला बुद्ध और सम्पूर्ण एशिया उसके रंग में रंगी उसमे लीन ।वाह!क्या बुद्धत्व को पराकाष्ठा है ! बुद्ध धार्मिकता से कहीं दूर एक सांस्कृतिक आभा है जिससे धरा आलोकित है । अतिवादिता से परे एक मध्यम मार्ग पर चलनेवाला दृष्टिकोण । वीणा के तारों की तरह एक संतुलित कसी हुई विचारधारा ही तो बुद्ध है जिसकी आज अति आवश्यकता है यशोधरा का जीवन अवश्य उदास हुआ ,राहुल अवश्य तड़पा किन्तु उन दोनों की पीड़ा अधिभौतिक थी जबकि बोधिसत्व की पीड़ा मृत्यु के पार की दृष्टि जपाने की पीड़ा थी जो एक अन्तविहीन काव्य की रचना करती है। यशोधरा में आकाश के आदमी की पीड़ा समाई है किंतु बुद्ध इससे परे स्वयं के बोध की कहानी रचते है ।वृक्ष की छाया में स्वयं को पाने वाला व्यक्ति बन्धन ,वर्ग ,लिंग को छोड़ कर बुद्ध एक विद्रोही चित्त ,एक सम्यक मन ले कर आगे बढ़ते हैं जहाँ अत्याचार ,विभेद ,विसंगति और शोषण को कोई स्थान नही इसलिए उनके सम्बोधन से पूरा आकाHश सिंदूरी हो गया ।जड़ चेतन हो गए ।भोर सिहर उठी ।हवा रेशमी हो गयी जैसे पूरी प्रकृति पुनर्जन्म ले कर अँगड़ाई ले रही हो । परम्पराएँ टूट गयी और क्षितिज स्वच्छ हो गया ।
ऊँच नीच की यंत्रणाओं के अंधेरे से निकल सिद्धार्थ बुद्ध हो गए ।रागादि से अभिभूत चित्त कहाँ बुद्ध की कल्पना कर सकता है ।आकाश अनन्त है ,असीम है जबकि संसार अकिंचन ,असंज्ञेय है जिसका क्षय निश्चित है । बुद्ध को क्षय कब स्वीकार हुआ ।राजसी भोग भोगने के बाद भी प्यास अतृप्त ही रही ।तभी तो बुद्ध बुद्धत्व प्राप्त करने की लिप्सा को त्याग स्वयं की खोज में निकल गये । आज भी समाज में जाति और वर्गों के भेद बने बैठे है । जिसको कहीं सम्मान न मिला वही बुद्ध की शरण मे जा कर निश्चिंत हो गया ।बुद्ध अर्थात रंगों का एक समुज्जवल समारोह ,प्राणिमात्र का मीत , अहिंसा का गीत ,मसनसिक अरुग्णता की जीत ,एक मानसिक चेतना ,एक सकारात्मक ऊर्जा और एक शांति की राह ।
सुशीला जोशी 'विद्योत्मा'
मुजफ्फरनगर
मार्च 13-2020
sushilajoshi24gmail. com
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