एलेनोर : एक विदेशी अम्बेडकर
12 जून 1916 में अमर उजाला समाचार पत्र में श्री श्योराज सिंह बेचैन का एक लेख पढ़ा जो अमेरिका वासी एक प्रोफेसर एलेनोर ज़िलिएट जो कर्लिटन कालिज में प्रोफ़ेसर थी ,पर लिखा गया था ।उन्होंने अपना पूरा ध्यान भारत की घिनौनी अमानवीय अस्पृश्यता सम्बन्धी सोच पर केंद्रित किया और दलित समाज पर अपनी लेखनी चला सैकडों शोध-पत्र प्रकाशित कराए ।उनको शुरूआत उन्होंने मराठी दलित साहित्य से की । उन्होंने 19वी सदी के के दलित साहित्य का अध्ययन किया और अपनों थीसिस कार्य भी उसी पर केंद्रित किया । अपने शोध कार्य में ब्रिटिश दलित विषयों के साथ मराठी दलित सन्तो को अधिक महत्व दिया ।इस कार्य को करने के लिए उन्हें भारत में आ कर यहाँ की अन्य भाषाएँ भी सीखनी पड़ी किन्तु मराठी पर अपना आधिपत्य जमाये रखा ।दलित-पैंथर-आंदोलन और बाबा अम्बेडकर का गहन अध्ययन किया ।
श्योराज सिंह लिखते हैं कि जब एलेनोर ने बाबा अम्बेडकर से उनके दलित आंदोलन को समझने के विषय मे पूछा तो बाबा साहब का उत्तर था -"आप मेरे मूक नायक ,बहिष्कृत भारत और समता आदि पात्रों की सहायता ले सकती हैं "।एलेनोर ने "अम्बेडकर वर्ल्ड"नाम की पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने अम्बेडकर का जीवन पर्यंत दलित उद्धार के प्रयासों का सिलसिलेवार वर्णन किया है ।उनकी शोध पुस्तक "फ्रॉम अनटचेबिलिटी टू दलित " किसी उपन्यास की तरह बिकी ।
एलेनोर ने अफ्रीका के अश्वेत-गुलामों के विषय मे भी बहुत कुछ लिखा या यों कह लीजिए कि वैश्विक समाज मे हो रहे भेदभाव पर बिना किसी हृदयगत भेदभाव के वह अपनी लेखनी लगातार चलाती रही ।
इस लेख में श्योराज सिंह अपने विचार रखते हैं कि विदेशी विश्व में मानव के प्रति हो रहे अमानवीय व्यवहारों के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं किन्तु देश विशेष में अपने ही देश के मानवों के मन अपने ही नागरिकों के प्रति कैसे विद्रूपता धारण कर लेते हैं ।
श्योराज सिंह 2009 में हिंदी-साहित्य-संस्थान लखनऊ के पुरस्कार सम्मेलन में मेरे साथ रहे जिन्हें एक लाख रुपये के साथ "साहित्य-भूषण"की उपाधि से सम्मानित किया गया था।उस समय वह शिमला में "हिंदी-दलित-साहित्य का इतिहास"पर कार्यरत थे। इनका शोध का बिषय-"हिंदी दलित पत्रकारिता पर पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव" था जी भारत का पहला प्रामाणित शोध कार्य है और 1919कि "लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड बुक"में स्थान प्राप्त है ।इस ग्रन्थ को स्नातकोत्तर स्तर के छात्रों को पढ़ाया भी जा रहा है ।इनकी एक कृति "मैं क्रौंच हूँ"कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है ।
सुशीला जोशी 'विद्योत्मा'
मुजफ्फरनगर
मार्च 22-2010
sushilajoshi24@gmail.com
एक सशक्त व्यक्तित्व को शशक्त लेखनी ने शब्दों की आकृति प्रदान कर दी है , बहुत सुंदर शब्द चित्रण बधाइयाँ
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