सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका:मेरी दृष्टि में

* प्रथमत: सराहनीय प्रयासकर्त्री छंदालिका के लिए कवयित्री सुशीला जोशी को हार्दिक बधाई ,सृजन की निरन्तरता के लिए अशेष शुभकामनाएं। जोशी जी उम्र के इस पड़ाव पर एक कुशाग्र विद्यार्थी की भांति सीखने की तलब से तड़पती हुई महसूस हुई। चिनगी सुलगाने के लिए प्रशंसा की पात्र हैं, बधाई की पात्र हैं। जब मुझसे इस पुस्तक के छंद- शोधन के विषय में कहा गया,मैंने सहज भाव से हामी भरी किन्तु मन ही मन शंकित था; शंका का जादुई समाधान प्रति पढ़ने पर हुआ। आश्चर्य इस बात पर भी हुआ कि एक महिला एक ही संग्रह में दोहा, रोला, घनाक्षरी,चौपाई, कुंडलियाँ और कलाधर जैसे क्लिष्ट छंदों पर इतनी सजता से मर्म स्पर्शी सृजन कैसे कर पाई। छंद वैविध्य होने के कारण कुछ त्रुटियों को मैंने अनुभव किया, कुछ असमंजसता की स्थिति में विचरण कर रहा था कि देखते ही देखते शोधन के माध्यम से उनके दृष्टिकोण से अपने दृष्टिकोण, भाव, अभिव्यक्ति, कथ्य या शब्दसंयोजन में एकताल होता चला गया। प्रकृति उनके सृजन का प्राण तत्व है; रोला, दोहा, कुंडलियाँ में प्रकृति ने उनके दृष्टिकोण को कहीं दार्शनिक बनाया तो कहीं आध्यात्मिक। इस प्रकार से इस सशक्त कलम की स्वामिनी सुशीला जी के छंदबद्ध संग्रह छंदालिका से पाठक वर्ग निश्चय ही लाभान्वित होने वाला है। कवयित्री का यह गद्य-पद्य सहित 11 वाँ एकल संग्रह है और लगभग 50 साझा संग्रह में प्रतिभागिता सहित दर्जनों पत्रिकाओं में समय-समय छपती रहती हैं। इस प्रकार से उनकी इस अद्भुद साहित्यिक यात्रा को देखते हुए यह स्पष्ट है कि सुशीला जी पाठक वर्ग की कमजोर नब्ज को अच्छे से पहचानती हैं अतः इनके इस संग्रह से पाठक वर्ग को पूर्ण संतुष्टि मिलती प्रतीत हो रही है। सृजन सत्यं -शिवं -सुंदरम की साधिका की ओर भी सशक्त संकेत कर रहा है -- जीवन की औकात है, पक्का पीला पात । हवा लगे से हिल उठे, झोकें से गिर जात ।। या फिर -- रूप गन्ध पर अधखिली, गरब करे खुश होय । खिले फूल की पाँखुरी , झरे धरा पर रोय ।। कवयित्री सुशीला प्रकृति में रमण के साथ- साथ समाजिक, राष्ट्रीय, राजनीतिक या फिर व्यक्तिगत बिंदुओं पर भी स्पष्ट अभिव्यक्ति से भी पीछे नहीं है -- झूठा बन कर रह गया, सच का दावेदार। असर झूठ का जब हुआ , दोधारी तलवार ।। यही दृष्टिकोण उनका रोला छंद में भी देखने को मिलता है -- नारी के अपमान तो, युगों युगों की रीत । अवतारों के संग भी, मिली न सच्ची प्रीत।। मिली न सच्ची प्रीत, सियासत फिर गरमाई । करके सभी निसार , मिली फिर भी रुसवाई ।। कभी भंग है शील, कभी शापित प्यारी का । अभी बढ़ो लो थाम, मान अबला नारी का ।। या फिर --- जलता रावण हर बरस, रहा जीतता राम । जले हृदय के जब दनुज, तभी राम अभिराम ।। तभी राम अभिराम, वृत्ति यदि बुरी मिटावे। दसो इन्द्रियाँ शुद्ध, मनुज साधू कहलावे ।। रावण का जब लोभ, हृदय में पलता रहता । शक्ति बाण को साध, बरस हर रावण जलता ।। घनाक्षरी में सुशीला जी शब्दों की चितेरी दिखाई पड़ती है । इस विधा में कहीं उनका दृष्टिकोण आध्यात्मिक लिए मानवीकरण को प्रस्तुत करता है--- मन उठी हूक तभी, शूल सी चुभे है मोय दामन पकड़ कभी, हँस बतियावे है । लचक लचक कभी, दामन दिखावे मोय दामन पे नन्हे नन्हे, दाग दिखावे है ।। कभी हँसे ताना मारे, दामन को छुवे कभी कभी मोरी कमरिया, छेड़ मटकावे है ।। दामन को पहने तो, दामिनी बतावे मोय कभी मोय दामन का, दाम बतियावे है ।। इस कवित्त में दामन और मोय की आवृत्ति कवित्त के सौंदर्य को द्विगुणित कर रही है। जोशी जी ने सायास या अनायस जगण का जी भर कर प्रयोग किया है जिसे उपयुक्त स्थान देने के लिए मुझे अच्छी खासी चर्चा करनी पड़ी और साथ ही महसूस किया कि जगण का प्रयोग उनसे अनायास ही हुआ जिसकी दुरूहता का उन्हें ज्ञान नही था। लेकिन जब उनसे चर्चा की गई तो उसका हल भी उन्होंने बड़ी सरलता निकाल लिया। उनके इस बुद्धि-वैपर्य से भी मुझे कम हैरानी नही हुई । सुशीला जी का परिवारिक परिवेश धार्मिक होने से उनके सृजन में आध्यात्मिकता व गाम्भीर्य का बोलबाला देखा जा सकता है। सुशीला जोशी जी की भाषा पर अवधी व उर्दू का प्रभाव स्पष्ट झलकता है । इसलिये उनके सृजन में आय, होत, कोय, कोउ, आत, जात आदि शब्दों या मात्रा पतन देखा जा सकता है। यदा कदा उर्दू के शब्द भी देखे जा सकते है। सम्भवतः यह उनके क्षेत्रीय परिवेश का प्रभाव हो सकता है। हिंदी से इतर शब्द प्रयोग अनभिज्ञता के कारण हुआ है इन सब बातों से ऊपर उठ कर देखा जाय तो सुशीला जी की भाषा शुद्ध सरल सर्व ग्राह्य हिंदी ही है। संजय कौशिक 'विज्ञात' शॉप न.7 धर्म शॉपिंग कॉम्लेक्स बिहोली मोड़, नजदीक पुलिस चौकी ,जी.टी. रोड समालखा, पानीपत, हरियाणा 132101 मोबाइल: 7015598477

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