ललित निबन्ध : मौसम
मौसम
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मौसम, जी हाँ ।जिसको रंगत अनूठी ,अटखेलियाँ अनोखी
,संवेदना अनुपम और महक मादक ।इठलाती बयार ,गुनगुनाती ,बूंदे,लहलहाती हरियाली महीन संगीत की चादर ओढ़ वार करती ,मानव हृदय पटल पर दस्तक देती है तो मन भी उमंग ,उत्साह ,स्फूर्ति व नव परिवर्तन में रमने लगता है ।गुनगुनी धूप में प्रकृति की
धड़कन की गति ,लय,ताल के अहसास को स्पर्श करती है ।कहीं
चेहरे पे स्वेद की बूंदे तो कहीं फूलों पर तुहिन कणों की छुवन मन
को अपने रंगों में सराबोर कर देती है । कहीं ठिठुरना तो कहीं
भीगना ;कहीं छाँह की चाह तो कहीं गुनगुनी धूप की मीठी सी
थपकी ;कहीं सुगन्ध का मादक अहसास के रंग यादों को तीखा
करता तो कहीं आँखो को नम ।कहीं कवि की कल्पना तो कहीं
प्राकृतिक सौंदर्य दर्शन के साथ उमड़ते गीत कहीं घुँघरू से
छनकाते ,चूड़ियां सी खनखाते, पायल सी बजाती और फिर सबकुछ
सम्मोहित सा।
हर मौसम का अपना मिजाज ,अपना अहसास , अपनी
शक्ति ,अपनी रंगत ,अपनी कल्पना ,अपने उपहार और अपने पर्व
।कहीं कोयल की कूक ,कहीं टटिहरी का पी-कहाँ पी-कहाँ की रटन ,कहीं पानी को तरसते प्राणी तो कहीं वृहद रूप धर हर मौसम
लुभाता है ,डराता है ,सताता है तड़पाता है ।
मानव पर हावी होता मौसम मानव को मानव कहाँ रहने देता है । कभी माथे पर पसीना पौछते मजदूर ,कभी अलाव सकते ठिठुरन को चुनौती देते फुटपाथ पर सोनेवाले बेगाने ,कभी बहते छप्पर के तिनके चुनते टूटते लोग बना देता है ।यहीं मौसम मानव को बच्चा ,किशोर ,युवा और वृद्ध भी बनाता है ।शायद यही परिवर्तन है जो विभिन्न रंगों में जीवन को स्फूर्तिवान और जीवित रखता है अन्यथा ठहराव मैं तो जीवन फफूँदी ग्रस्त हो कर रह जाता है ।
सुशीला जोशी 'विद्योत्मा'
मुजफ्फरनगर
मार्च 16-2020
sushilajoshi24@gmail.com
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