पुस्तक समीक्षा: छंदालिका ; छंदालिका मेरी दृष्टि में

 *सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका  मेरी दृष्टि में*......

       कुछ दिन पूर्व सुशीला जोशी की पुस्तक छंदालिका सुशीला जी के कहने पर मेरे पास सीधे प्रकाशक से आईं। मुझसे इस पुस्तक के छंद- शोधन  की  बात कही गयी थी ।  पुस्तक पढ़ने पर आश्चर्य इस बात पर हुआ कि एक महिला एक हीसंग्रह में दोहा , रोला , घनाक्षरी ,चौपाई , कुंडलियाँ और कलाधर छंद कैसे पर पाई । पढ़ कर यह भी अनुभव किया कि सम्भवतः यह उनकी पहली  शास्त्रीय - छांदस  पुस्तक हो इसलिए मुझे उनसे संपर्क इसलिए  साधना पड़ा  क्योकि मैं नही चाहता  था कि शोधन के माध्यम से उनका अपना दृष्टिकोण , भाव, अभिव्यक्ति , कथ्य  या शब्दसंयोजन बदले या छिपे । इसलिए एक एक शब्द उन्ही के द्वारा रखा या बदला गया । उनकी छन्दों को पढ़ महसूस हुआ कि प्रकृति  उनके सृजन का प्राण तत्व हैरोला ,दोहा ,कुंडलियाँ  में प्रकृति ने उनके  दृष्टिकोण को कहीं दर्शनिक बनाया तो कहीं आध्यात्मिक । उनका सृजन सत्यं -शिवं -सुंदरम की साधिका की ओर संकेत कर रहा है --
 
जीवन की औकात है ,पक्का पीला पात ।
हवा लगे से हिल उठे ,झोकें से गिर जात ।।
      या फिर --
रूप गन्ध पर अधखिली, गरब करे खुश होय ।
खिले फूल की पाँखुरी , झरे धरा पर रोय ।।
     जहाँ एक ओर वह प्रकृति में रमी सत्यं -शिवं-सुन्दरं को साधती दिखाई पड़ती है वहीं समाजिक ,राष्ट्रीय ,राजनीतिक या फिर व्यक्तिगत बिंदुओं पर भी बेलाग अभिव्यक्ति से भी पीछे नही रहती --

झूठा बन कर रह गया , सच का दावेदार ।
असर झूठ का जब हुआ , दोधारी तलवार ।।
 यहीं दृष्टिकोण उनका रोला छंद में भी देखने को मिलता है --

  नारी के अपमान तो ,युगों युगों की रीत ।
अवतारों के संग भी , मिली न सच्ची प्रीत ।।
मिली न सच्ची प्रीत , सियासत फिर गरमाई ।
करके सभी निसार , मिली फिर भी रुसवाई ।।
कभी भंग है शील ,कभी है शाप प्यारी का ।
अभी  तलक न थमा  , अपमान नारी का ।।
     या फिर ---
जलता रावण हर बरस , रहा जीतता राम ।
जले हृदय के दनुज भी ,तभी राम अभिराम ।।
तभी राम अभिराम , कुवृत्तियाँ यदि मिटावे  ।
दसो इन्द्रियाँ शुद्ध , मनुज साधू कहलावे ।।
रावण लोभ का जब , हृदय में पलता रहता ।
शक्ति बाण को साध , हर बरस रावण जलता ।।

  घनाक्षरी में सुशीला जो शब्दों की चितेरी दिखाई पड़ती है । इस विधा में कहीं उनका दृष्टिकोण आध्यात्मिक दिखाई देता तो कहीं मानवीकरण की चितेरी भी ---

   मन उठी हूक तो , शूल सी चुभे है मोय
दामन पकड़ कभी , हँस बतियावे है ।
लचक लचक कभी , दामन दिखावे मोय 
दामन पे नन्हे नन्हे , दाग दिखावे है ।।
कभी हँसे ताना मारे , दामन को छुवे कभी 
कभी मोरी कमरिया ,छेड़ मटकावे है ।।
दामन को पहने तो , दामिनी बतावे मोय 
कभी मोय दामन का ,दाम बतियावे है ।।
इस घनाक्षरी में दामन और मोय की आवृत्ति उसके सौंदर्य को द्विगुणित कर रही है । 
     जोशी जी ने सायास या अनायस जगण का जी भर कर प्रयोग किया है जिसे उपयुक्त स्थान देने के लिए मुझे अच्छी खासी चर्चा करनी पड़ी और साथ ही महसूस किया कि जगण  का प्रयोग उनसे अनायास ही हुआ जिसकी दुरूहता का उन्हें ज्ञान नही था । लेकिन जब उनसे चर्चा की गई तो उसका हल भी उन्होंने बड़ी सरलता निकाल लिया । उनके इस बुद्धि -वैपर्य  से भी मुझे कम हैरानी नही हुई । 
    सम्भवतः सुशीला जी का परिवारिक परिवेश धार्मिक रहा होगा इसलिए उनके सृजन में आध्यात्मिकता व गाम्भीर्य का बोलबाला देखा जा सकता है । 
      सुशीला जोशी जी की भाषा पर अवधी व उर्दू का प्रभाव स्पष्ट झलकता है ।इसलिये उनके सृजन में आय,होत ,कोय ,कोउ , आत, जात शब्दों या मात्रा पतन देखा जा सकता है । यदा कदा उर्दू के शब्द भी देखे जा सकते है । सम्भवतः यह उनके क्षेत्रीय परिवेश के प्रभाव हो सकता है । इन सब बातों को परे धकेल यदि देखा जाय तो सुशीला जी की भाषा शुद्ध सरल सर्व ग्राह्य हिंदी ही है । हिंदी से इतर शब्दो का प्रयोग उनकी अज्ञानता या विवशता भी हो सकती है ।

 


   सजंय कौशिक - विज्ञात 
           पानीपत 

Comments

  1. आदरणीय! बहुत निष्पक्ष समीक्षा प्रस्तुत की है! पढ़कर पुस्तक के प्रति जिज्ञासा बढ़ी।निःसंदेह आदरणीया सुशीला विद्योत्मा जी के पास ज्ञान का अथाह भंडार है जिसका परिचय हमें उनकी रचनाओं के माध्यम से मिलता रहता है।उनकी रचनाएँ हमारे लिये पथ प्रदर्शक का कार्य करती हैं।उनसे बहुत कुछ सीखना है।🙏

    ReplyDelete
  2. उम्दा समीक्षा। लेखिका विद्योत्मा जी सृजन की वो खान हैं जिनकी कर में कलम आकर स्वयं को धन्य मानती होगी। यद्पि उर्दू शब्दों के प्रयोग की बात भी समीक्षा में उठी है तथापि समीक्षा ने छंदालिका पढ़ने हेतु लालयित किया।

    ReplyDelete
  3. पुस्तक की समीक्षा सिर्फ एक समीक्षक की नज़र से परे एक उत्तम समालोचक की विहंगम दृष्टि का परिचय दे रही है ,एक सच्चे समालोचक की तरह पुस्तक और लेखन के सभी उच्च मध्यम पहलूओं पर सम भाव से सुंदर समीक्षा ‌ देने के लिए आदरणीय विज्ञात जी को साधुवाद और बधाईयां।
    आदरणीय शुशीला जी "विद्योत्तमा" जी को उनके इस संग्रह के लिए अशेष बधाईयाँ एवं शुभकामनाएं।
    पुस्तक की विस्तृत समीक्षा पुस्तक को पढ़ने का आकर्षण बढ़ा रही है।
    पुनः लेखिका एंव समीक्षकजी को बहुत बहुत बधाईयाँ।

    ReplyDelete
  4. बहुत शानदार समीक्षा आपकी । सुशीला जोशी दीदी जी को बधाई

    ReplyDelete
  5. अप्रतिम रचना कारा हैं आदरणीया दीदी,
    उनकी लेखनी अद्भुत है ,आपकी समीक्षा ने
    उसमें चार चाँद लगा दिए। बेहतरीन, बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  6. अप्रतिम रचना कारा हैं आदरणीया दीदी,
    उनकी लेखनी अद्भुत है ,आपकी समीक्षा ने
    उसमें चार चाँद लगा दिए। बेहतरीन, बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  7. जीवन की औकात है ,पक्का पीला पात ।
    हवा लगे से हिल उठे ,झोकें से गिर जात ।।
    सत्य कथन
    बहुत ही सुन्दर समीक्षा गुरु देव
    आ.सुशीला जोशी दीदी जी को बहुत बहुत बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं

    ReplyDelete
  8. बहुत ही शानदार और निष्पक्ष समीक्षा 👏👏👏👏👏

    ReplyDelete

Post a Comment