नवगीत

एक नव गीत यूँ ही नही कृष्ण बना मैं ।। घने तम को झेला मैने कारावास में जन्म लिया जन्मते ही मात त्याग का कालकूट भी पी ही लिया होता रहा घना घना मैं ।। उस समय तूफान बड़ा था यमुना में उफान बड़ा था सूप बैठा पिता शीश पर हृदय में प्रतिमान बड़ा था लेटा रहा ठना ठना मैं ।। मथुरा छोड़ गोकुल आया एक नया परिवार पाया नित आक्रमण मैंने झेले रहा सदा मौत का साया प्रतिदिन मरा कई गुना मैं । बड़ा हुआ राधिका आय बड़ा हुआ राधिका आयी किन्तु साथ नही रह पायी जिसे चाहा मिला नही वह जो मिला वह थी चतुराई हारा ईश मना मना मै ।। सीमा पार प्रेम हुआ जब वस्त्र वत त्यागा था मैंने राजनीतिक दाँव पेंच में निजपन भी त्यागा मैंने होता रहा फना फना मैं ।। मैंने युद्ध नही किया था गाड़ीवान था बन बैठा शाप ओढ़ वंश-नाश का रहा उमर भर अनमना मैं ।। ब्रह्म ने भेजा था मुझको द्वापर युग की बना समिधा देता रहा रोज आहूति हृदय दबाए कई दुविधा यूँ ही अच्युत नही बना मैं।। सुशीला जोशी 'विद्योत्तमा' मुजफ्फरनगर मार्च 13-2020 sushilajoshi24@gmail.com


Comments

  1. ब्लॉग की दुनिया में आपका हार्दिक अभिनंदन है , बहुत सुंदर नवगीत यूँ ही नहीं कृष्ण बना मैं, जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है

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