ललित निबन्ध : वसुधैवकुटुम्बकम

     एक ललित निबंध
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   -<<<< वसुधैवकुटुम्भकम >>>>>-
      वसुधैवकुटुम्भकम -अर्थात पूरी वसुधा अपना एक कुटुम्भ
 है । हमारी संस्कृति की आत्मा ,कार्य क्षेत्र और मानवीय एहसास । अर्थात -विभिन्न शरीरों में एक ही प्राण-तत्व की प्रतिष्ठा की अनुभूति ,प्राणिमात्र की रक्षा का संकल्प किन्तु हर मानव का ,हर देश का ,हर समाज का ,हर वर्ग का अपना एक अस्तित्व की चमक ,मान ,सम्मान और अभिमान देने की शपथ ।
       अपने परिवार की तरह हर परिवार को अपना मान दूसरे परिवार की कन्या को अपने घर की स्वमिनी बंनाने की एक रीत ,एक परम्परा ,एक पहल और व्यष्टि मर समष्टि की कल्पना का क्रियान्वयन । उसकी सन्तान को आनेवाली पीढ़ी की इकाई का अधिकार देने का एक कर्तव्य । सम्पूर्ण धरा पर रहनेवाले किसी भी नर नारी को जोड़ा बनाने के अधिकार की भावना । कितनी विशद सोच रखनेवाली संस्कृति। साथ हो अपनी संस्कृति को विशुद्ध मौलिक रूप में बनाये रखने का एक प्रयास भी । वर्ण-संकर नस्ल तो जानवरो में भी मान्य नही । इसीलिए अपनी जाति ,रीति-रिवाज और संस्कारों को बचाने की एक भावना ।
           कुटुम्भ में जाति-प्रजाति के भरण पोषण का संकल्प जिसमें चींटी से ले कर बड़े बड़े जानवरो को अपने परिवार का सदस्य मान लेने की अनुभूति ,उनसे आधिदैविक या  फिर अधिभौतिक लाभ कमाने की ललक ,उदार चित्त की परिचायक और परोपकार की पराकाष्ठा । विधाता की श्रेणी में
मानव को लाने का एक मार्ग ।अंततः पृथ्वी पर निवासित हर प्राणी कुटुम्भ का ही तो सदस्य है । वही परिवार ,वही कुटुम्भ जिसमें कभी हिंसा का तांडव होता है तो कभी प्रेम की गंगा बहती है । कभी लेन-लेन का व्यापार होता है तो कभी दयाभाव की लहर में सम्पूर्ण समर्पण भी , दान-महादान  भी और त्याग की साधना भी ।सिद्धार्थ सबकुछ त्याग कर बुद्ध हो गए तो वर्धमान राज-वैभव को त्याग महावीर बन गए ।
          जब जब कुटुम्भ में त्याग का स्थान लिया ,त्यागी परामानन्दी हो कर देव श्रेणी में आ खड़े हुए ।कबूतर के लिए स्वयं के मांस को काट काट देनेवाले शिवि देवत्व को प्राप्त कर पाए । यही तो कुटुम्ब को बनाये रखने की भावना जो एकरूपता के विस्तार के लिए विवधता के दमन का प्रयत्न नही करती ,तेरे-मेरे के आधिपत्य को स्वीकार नही करती ,भेद-भाव को बढ़ावा नही देती ,अपने -पराये के अंतर पर दृष्टि नही गड़ाती ,छोटे-बड़े ,ऊँच-नीच ,जाति-धर्म मे अंतर नही देखती । यही तो भरतीय संस्कृति की धुरी है , बुद्ध का ज्ञान है और महावीर की दृष्टि है । आत्मवतसर्वभूतेषु - का आधार है । अर्थात इस धरती पर जो कुछ भी ईश्वर ने उपहार स्वरूप दिया उस पर सबका समान अधिकार है । जिसके संचय करने की कोई आवश्यकता ही नही ।स्थिति पक्ष में हो या विपरीत ,वसुधा हर जीव की प्राण रक्षा करने में सदैव उत्तरदायी है ,कटिबद्ध है । पेड़ फल स्वयं झाड़ देते है ,नदी सदैव बहती है ,प्राणवायु सबको स्वयं न बाट कर सबके लिए स्वतंत्र छोड़ रखी है । ईंधन के लिए सूखने पर लकड़ियां वृक्ष स्वयं झाड़ते रहते है । स्रष्टा के इस विधान में भला स्वार्थ किस द्वार से प्रवेश करेगा । उसके दृष्टिकोण में ढाई अक्षर का वास है ।यही तो प्रेम है जो आकाश की तरह विस्तृत ,और सागर की तरह गहन है । ईश्वर की तरह सर्वव्यापी है । जहाँ प्रेम नही वहाँ ज्ञान कैसा? जहाँ ज्ञान नही वहाँ ध्यान कहाँ ? प्रेम के समंदर में ही तो डूब कर पूरी वसुधा कुटुम्ब बनती है ।संस्कृति की इस धुरी में परमहंस का मार्ग निहित है ।जिसके नियमन बड़े कड़े है ।जिसका आदेश पत्थर की लकीर है जिसमें वृत्ति -कुवृत्ति में कोई समझौता नही । जिसका अपना एक जनून है ,धुन है, हठ है ,एक निश्चित फैसला है और निश्चिंतता है । जिसमें "सहनौभु नक्तु सहवीर्यंकरवावहे" निहित है ,जो जड़ जंगम जगत में "आत्मवतसर्वभूतेषु " की दृष्टि रखता है । यही तो वह बीज मन्त्र है जिसे  मानवता अपना आधार बनाती है ।

      सुशीला जोशी "विद्योत्मा"
     मुजफ्फरनगर
 मार्च 132020
sushilajoshi24@gmail. com

Comments

  1. आदरणीया सुशीला जोशी विद्योत्मा जी बहुत सुंदर वसुधैव कुटुम्बकं को बल देता हुआ , बहुत सुंदर लेख लिखा है, आपकी सशक्त कलम से इस प्रकार के लेख अनेक विषयों पर अपेक्षित रहेंगें बधाई एवं शुभकामनाएं

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