हिंदी उर्दू के एक अलमबरदार : बेकल उत्साही

आज का बेकल उत्साही कल का मोहम्मद शफी खान था जिसका जन्म 1 जून 1928 में बलरामपुर के गौर रमवापुर गाँव में हुआ था । उनकी आरम्भिक शिक्षा बलरामपुर के एम०पी० इनंटर क्लिक में हुई । 'बेकल'उनका साहित्यिक नाम था जो तात्कालिक भारत के प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने प्रदान किया था ।स्वतन्त्रता संग्राम के समय अपने जन जागरण फैलाने वाले गीतों के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा । 1952 में इन्होंने एक कौमी एकता पर गीत लिखा जिसका इन्हें विरोध झेलना पड़ा ।1953में इन्होंने देशभक्ति से ओत-प्रोत एक 'रसिया'लिखी । 1986 में इन्हें राज्यसभा के सदस्य के लिए मनोनीत किया गया ।बेकल जी जवाहरलाल और इंदिरागांधी के बहुत निकट रहे ।राजीवगांधी उन्हें अपना अभिभावक मानते थे । उत्साही जी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । उन्होंने अरबी ,फ़ारसी ,उर्दू ,हिंदी तथा संस्कृत भाषाओं में महारथ हासिल की । इन्हे आरम्भ से ही कविसम्मेलनों और मुशायरों का शौक था । वे श्रृंगार के अतिरिक्त सामयिक विषयों पर भी कविताएँ व गजल लिखते थे ।उनका एक शेर:- जब से हम तबाह हो गए तब से आप जहाँपनाह हो गए। बहुत प्रसिद्ध हुआ जिसे गुलाम भारत की सामन्तवादी व्यवस्था पर एक कड़ा प्रहार के रूप में देखा जाता था । उर्दू शायरी में गीत नही लिखे जाते वरन अशआर लिखे हैं तो नज्म कर रूप में लिखे जाते हैं ।उत्साही जी के हिंदी की लय पर ,हिंदी की शब्दावली के साथ लिखे अशआर नींव के पत्थर साबित हुए :- अगर सत्ता बहुमत में हो तो साझा तोड़ देती है सियासत बाप बेटे की रिश्ता तोड़ देती है जैसी पँक्तियाँ हो या फिर--- माँ!मेरे गूंगे शब्दों को गीतों का अरमान बना दे गीत मेरा बन जाये कन्हाई फिर मुझको रसखान बना दे जैसा चार चरणों का गीत हो ,सब में उनके विशद दृष्टिकोण के दर्शन होते हैं उत्साही साहब बड़े ही आत्मविश्वासी और दृढ़ प्रतिज्ञ थे । वे किसी भी अदबी गिरोह में शामिल नही हुए ।वे ऐसी खास जबान में शेर कहते रहे जिसे अदब के कुछ मग़रूर लोग 'देहाती वाली' के शायर जैसे विशेषण का ठप्पा लगाते रहे साथ ही हिंदी उर्दू के बीच पएक मजबूत पुल भी मानते रहे ।उनकी रचनाओँ का पूर्वी लहजा ,जनता की भाषा मे जनता तक पहुँचाने का हुनर ,सादगी भरा मिजाज ,शरीफाना लिबास और सुंदर बुद्धपूर्ण शब्दचयन जैसी विशेषताएं उन्हें दूसरों से अलग करती है । उनका ये शेर -- सबके होंठो पे तबस्सुम था मेरे कत्ल के बाद जाने क्या सोच के रोता रहा मेरे कत्ल के बाद। आज भी सरेआम सुना जा सकता है । जहां वे शेरोशायरी के शौकीन माने जाते हैं वहीं एक कठोर न्यायाधीश भी उनके भीतर देखा जा सकता है ।शायद मुनव्वर राणा के साथ एक बार 2006 में बेकल साहब कराची में मुशायरे में भाग लेने लेने पहुँचे जहाँ पर मुनव्वर राणा को मंच पर उस समय आवाज दी जब सवेरे को अज़ान हो रही थी ।उन्होंने बेकल साहब की तरफ देखा और उनके इशारे पर इस शेर के साथ --- मेरे मुल्क हिंदुस्तान में अज़ान के बाद नमाज होती हैं मुशायरा नही कह कर पाकिस्तान की इस्लाम का पाठ पढ़ा दिया और मुशायरा खत्म हो गया और बेकल साहब के गले लग कर शुक्रिया अदा किया । अपनी शख्सियत के विषय मे खुद बेकल साहब लिखते है - सुनहरी सरजमी मेरी रुपहला आसमां मेरा मगर अब तलक नही समझा ठिकाना है कहाँ मेरा किसी बस्ती को जलते हुए देखा तो ये सोचा मैं खुद ही जल रहा हूं औ फैला है धुँआ मेरा सुंकू पाए चमनवाले हरइक घर रोशनी पहुँचे मुझे अच्छा लगेगा तुम जला दो आशियां मेरा बचा कर रख उसे मंजिल से पहले रूठने वाले तुझको रस्ता दिखायेगा गुबारे कारवाँ मेरा गोंडा हलचल प्रेस ,नगमा तरन्नुम ,निशाते जिंदगी ,नूरे याजन्दा ,लहके बगिया महके गीत ,अपनी धरती ,चाँद का दर्पण आदि उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ है । 1975में साहित्यसेवा के लिए 'पद्मश्री' की उपाधि से सम्मानित किया गया ।2005 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 'यशभारती'को उपाधि से सम्मानित किया ।इसके अतिरिक्त हिंदी संस्थान द्वारा सौहाद्र सम्मान से भी नवाजे गए ।इसके अतिरिक्त अन्य कई संस्थाओ से सम्मानित होते रहे । 88 वर्ष की आयु में स्नान गृह में गिरने के कारण ब्रेन हैमरेज के कारण रविवार 4 दिसम्बर को उनकी दिल्ली के राममनोहर लोहिया हस्पताल में उस बिभूति निधन हो गया जिसने गंगोजमनी तहजीब को कोने कोने तक पहुँचा पाये । 2006 में इलाहाबाद साहित्यिक पत्रिका 'गुफ्तगू'में उनका एक विशेषांक छपा जिसमे वे अपने साक्षत्कार में स्वयं के प्रगतिवादी होने के विषय मे बताते हैं कि- " बदलाव साहित्य में हो या राजनीति में, समाज मे हो या अध्यात्म में ,इसमें सोच और माहौल दोनो का असर पड़ता है इसीलिए एक ही परम्परा को आगे तक खींच कर ले जाना हर किसी के लिये सम्भव नही ।" साहित्यिक पुरस्कारों के विषय मे वह कहते हैं "यह एक गुटबन्दी है जो अच्छे और उदार दृष्टिकोण वाले रचनाकार को आगे बढाने में आड़े आती है ।अगर लेखन में फिक्र और फन को छोड़ दिया जाय तो लेखन में फूहड़ता आ जाती है ।दूसरों के मोहताज रह कर स्वतंत्र लेखन सम्भव नही हो सकता ।किसी की दी हुई धुन या बहर या संगीत पर लिखे गए गीतो में स्वातन्त्र्य का अभाव स्पष्ट झलकता है । आज की युवा पीढ़ी साहित्य से दूर दिखाई देती है उसका कारण है युवकों द्वारा भी साहित्य को व्यवसाय के रूप में देखने की दृष्टि । 'भूखा युवा क्या साहित्य लिखेगा' जैसी सोच रखनेवाले शायर थे बेकल उत्साही साहब । बेकल जी व्यंग में जीते थे ।एक बार जब पण्डित नेहरू मंच पर सदारत करने जा रहे थे तो उनका पाँव अचानक फिसल गया । बेकल उत्साही और दिनकर जी ने उन्हें आगे बढ़ कर सम्हाला ।जब उन्होंने शुक्रिया अदा किया तो दिनकर जी ने कहा -"जब राजनीति लड़खड़ाती है तो सहित्य उसे सम्हालता है ।अब राजनीति ही इतनी बेईमान हो गयी कि साहित्य ने भी अपना ईमान खो दिया ।" इस पर बेकल उत्साही ने चुटकी लेते हुए कहा -" पे अब तो साहित्य का ईमान बहुत तीखा दिख रहा है।" ऐसे चुटीले थे बेकल उत्साही । सुशीला जोशी"विद्योत्मा' मुजफ्फरनगर 17मार्च 2020 sushilajoshi24@gmail.com

Comments

  1. बेकल जी के विषय में बहुत अच्छी जानकारी मिली ।धन्यवाद

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