विरोधाभास ; ,हिंदी साहित्य की एक आवश्यकता

विरोधाभास लेखन की वह अलंकार या शैली है जिससे किसी कहन में विरोध न होते हुए भी विरोधी आभास दे जाता है । जैसे - " सुधि आय , सुधि जाय " "पिल्ले तो रोज गाड़ी के नीचे आते जाते रहते है।" यद्यपि इन वाक्यों में कहीं कोई विरोध नही है लेकिन फिर भी विरोध का आभास दे रहा है । यदि विचार किया जाय तो पूरी प्रकृति विरोधाभास पर टिकी है । जन्म -मरण, दुख -सुख , प्रेम -घृणा, निर्माण -विनाश जैसे आधार ले कर प्रकृति अडिग खड़ी विरोधाभास का निर्वहन कर रही है , क्योकि ये एक दूसरे के पूरक हैं । प्रकृति को अक्षुण बनाये रखने में सहायक है । प्रकृति के क्रियाकलाप परिवर्तन व विनाश के आधार पर ही सम्भव हैं । असंगति , विभावना , और विशेषोक्ति सब विरोधाभास के ही पर्याय हैं या ये सब विरोधाभास के प्रकार हैं । *विरोधाभास क्या है? 1-- पद में कोई विरोधी बात या विचार न होते हुए भी जब कोई विरोध जताता है तो उसे विरोधाभास कहा जाता है --- या अनुरागी चित्त की, गति समझे न कोय *ज्यों ज्यों बूड़े श्याम रंग, त्यों त्यों उजले होय* अवध को अपना कर त्याग से तपोवन प्रभु ने किया भरत ने उनके अनुराग से भवन में वन का व्रत लिया 2--एक ही वाक्य में आपस मे कटाक्ष करते हुए दो या दो से अधिक भावों का प्रयोग किया जाय --वहाँ विरोधाभास होता है -- *मुहब्बत एक मीठा जहर 3--एक ही वक्तव्य में विरोधाभाषी या विरोधी विचारों को प्रतिपादित किया गया हो ,वहाँ विरोधाभास होता है -- *गर्जनापूर्ण शांति/ मीठा दुख 4-वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास ही विरोधाभास है -- *बिषमयी गोदावरी , अमृतं जल देय प्रकार... असंगति-- दो असम्भव चीजों के एक साथ प्रयोग में असंगति विरोधाभास होता है --- मैं अंधा भी देख रहा हूँ ,तुम्हारा रोना विभावना--- बिना कारण के किसी कार्य की संभावना दर्शाना विभावना विरोधाभास होता है -- नीर भरे नितप्रति रहे, न तो प्यास बुझाई विशेषोक्ति-- किसी असम्भव बात को विशेष परिस्थितियों में सम्भव दर्शाने के लिए विशेषोक्ति का प्रयोग किया जाता है -- वन सुन्य जबते मधुर , तबते सुनत न बैन बिनु पड़ चलै ,सुनै बिनु काना विरोधाभास का प्रतिपादन.... विरोधाभास को दो प्रकार से प्रतिपादित किया जा सकता है 1---तार्किक रूप में इस प्रकार में बहुधा विरोध तर्कसंगत होता है -- नाई अपने बाल अपने आप नही काटता 2--गणित रूप में---- इसके प्रतिपादन में सबको एक सी संज्ञा दी जाती है -- लंका में सभी बावन गज के विरोधाभास की आवश्यकता ..... साहित्य में आज के तकनीकी युग मे विरोधाभास की बहुत आवश्यकता है क्योंकि--- 1---यह वर्ण -सम्बंधी जटिलताओं के बारे में सोचने को विवश करता है । 2--यथार्थ को परखने को विवश करता है । 3-- यद्यपि कभी कभी दुविधा भी उतपन्न करता है किंतु फिर भी उसके निराकरण का मार्ग दिखाता है ।। 4--- लेखक के अंतरात्मा की दुविधा को प्रस्तुत करता है । 5-- विरोधाभास सत्य व्यक्ति परक है । 6-- सरकार द्वारा परिभाषित विरोधाभास भी व्यक्तित्वों व भूखण्डों से जुड़ी परतों और गहराइयों से जुड़ा हैं । सामाजिक , राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय असंगतियों का हल ढूंढता है । 7--लेखक के बुद्धि वैपर्य को निखार कुशाग्र बनाता है सुशीला जोशी 'विद्योत्मा' मुजफ्फरनगर मार्च 24-2020 sushilajoshi24@gmail.com

Comments

  1. निःसंदेह विरोधाभास अलंकार की महत्वपूर्ण जानकारी जिससे नवकलमकारो को लाभ प्राप्त होगा, हिन्दी कविता में अलंकारों के आ रहे आभाव के चलते आपकी इस चर्चा का और भी महत्व बढ़ जाता है। इस प्रकार की ज्ञानवर्धक पोस्ट की अपेक्षा रहती है आपसे , बधाई एवं शुभकामनाएं

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